नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सोमवार को राज्यसभा में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सामान्य प्रशासन) विधेयक, 2026 पेश करेंगे। यह प्रस्तावित कानून CRPF, BSF, ITBP, CISF और SSB जैसे केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में भर्ती, प्रतिनियुक्ति, पदोन्नति और सेवा शर्तों को एक समान कानूनी ढांचे में लाने के लिए लाया जा रहा है। संसद के कार्यसूची दस्तावेज और सुप्रीम कोर्ट के 23 मई 2025 के फैसले से यह स्पष्ट है कि यह विधेयक CAPF में IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति और कैडर प्रबंधन को लेकर जारी विवाद के बीच आया है।
क्या है CAPF बिल 2026
यह विधेयक एक तरह का अम्ब्रेला लॉ होगा, जिसके जरिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के ग्रुप-ए जनरल ड्यूटी अधिकारियों और अन्य अधिकारियों की भर्ती, प्रतिनियुक्ति, पदोन्नति और सेवा शर्तों को विनियमित किया जाएगा। अभी अलग-अलग बल अपने-अपने कानूनों और नियमों के तहत चलते हैं, जिससे सेवा संबंधी मामलों में बिखरी हुई व्यवस्था और मुकदमेबाजी बढ़ी है।
IPS प्रतिनियुक्ति पर क्या प्रस्ताव है
प्रस्तावित कानून के अनुसार, CAPF में इंस्पेक्टर जनरल (IG) रैंक के 50 प्रतिशत पद IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से भरे जाएंगे। वहीं अतिरिक्त महानिदेशक (ADG) रैंक के कम-से-कम 67 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति से भरे जाने का प्रावधान है। स्पेशल डीजी और डीजी रैंक के पद केवल प्रतिनियुक्ति से भरे जाने का प्रस्ताव है। यह प्रावधान बिल के सबसे अहम और विवादित हिस्सों में गिना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्यों आया बिल
23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया था कि सभी CAPF में लंबित कैडर रिव्यू छह महीने में पूरा किया जाए और IPS प्रतिनियुक्ति वाले पदों को वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड तक समयबद्ध तरीके से घटाने पर विचार किया जाए, ताकि CAPF कैडर अधिकारियों में पदोन्नति ठहराव कम हो और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़े। बाद में अक्टूबर 2025 में केंद्र की समीक्षा याचिका भी खारिज कर दी गई।
केंद्र का तर्क क्या है
प्रस्तावित विधेयक के उद्देश्यों के मुताबिक, IPS एक अखिल भारतीय सेवा है और CAPF में उनकी प्रतिनियुक्ति ऐतिहासिक रूप से व्यवस्था का हिस्सा रही है। केंद्र का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा और राज्यों के साथ समन्वय को देखते हुए CAPF में IPS अधिकारियों की मौजूदगी जरूरी है, इसलिए मौजूदा प्रतिनियुक्ति व्यवस्था को बनाए रखना प्रशासनिक और संघीय दृष्टि से अहम है।
क्यों हो रहा है विरोध
सेवानिवृत्त CAPF अधिकारियों का एक समूह इस प्रस्तावित कानून का विरोध कर रहा है। उनका कहना है कि नेतृत्व पदों पर प्रतिनियुक्ति का ऊंचा अनुपात CAPF कैडर अधिकारियों के प्रमोशन के अवसर सीमित करता है, जिससे लंबे समय से ठहराव और असंतोष पैदा हुआ है। इसी मुद्दे पर कुछ पूर्व अधिकारियों ने गृह सचिव के खिलाफ अवमानना याचिका भी दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में माना था कि पदोन्नति में रुकावट बलों के मनोबल पर असर डाल सकती है।
बिल के पीछे सरकार की दलील
सरकार का कहना है कि अभी अलग-अलग बलों में सेवा नियमों को लेकर व्यवस्था बिखरी हुई है। इस वजह से बार-बार कानूनी विवाद होते हैं और प्रशासनिक मुश्किलें आती हैं। ऐसे में एक साझा कानून लाकर भर्ती, प्रतिनियुक्ति, पदोन्नति और अन्य सेवा शर्तों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना जरूरी है, ताकि कानूनी स्पष्टता आए और संचालन व्यवस्था मजबूत हो।
क्या होगा अगला कदम
विधेयक पहले राज्यसभा में पेश होगा। इसके बाद उस पर चर्चा, संशोधन और पारित होने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। बिल का अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि संसद में बहस के दौरान प्रतिनियुक्ति को लेकर मौजूदा प्रावधानों में कोई बदलाव होता है या नहीं।
