मंडी. करसोग का सरकारी अस्पताल बस नाम का ही अस्पताल बन कर रह गया है. अस्पताल में डॉक्टरों की भारी कमी है. इस अस्पताल में हर रोज तकरीबन 300 मरीज आ रहे हैं, लेकिन अस्पताल अधिकतर मरीजों को शिमला रेफर करने का ही काम करता है. लाचार मरीजों को 120 किलोमिटर दूर शिमला जाना पड़ रहा है.
रैफर हुए कई रोगी रास्ते में ही दम तोड़ देते है. जिसकी जिम्मेवारी न तो सरकार लेती है और न ही स्वास्थ्य विभाग. कई संगठनों ने इस मामले को लेकर अनशन भी किये लेकिन कुछ नहीं हुआ. इस क्षेत्र में तकरीबन डेढ़ लाख लोग रहते हैं, उसपर से अस्पताल में डॉक्टरों का न होना सरकार के कई दावों की पोल खोल रहा है.
स्त्री रोग विशेषज्ञ नहीं होने के चलते गर्भवती महिलाओं को ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. मरीजों को निजी सेंटर में जाकर ईलाज करवाना पड़ता है या फिर शिमला या मंडी जाकर काफी धन खर्च करना पड़ता है.
कई रोगी पैसों के अभाव में झोलाछाप डॉक्टर के पास जाते हैं जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पडता है. समाजसेवी पूर्णचंद कौडल का कहना है कि करसोग अस्पताल पर सरकार द्वारा भवन बनाने के लिए करोड़ो रूपये खर्च किए गए, लेकिन इसमें लिफ्ट नहीं लगाई. इसके साथ ही विशेषज्ञ डाक्टरों की नियुक्ति करना सरकार भूल गई. मात्र एक मेडिसीन विशेषज्ञ बिठाकर कुछ नही हो सकता है.
चिकित्सा अधिकारी राकेश प्रताप का कहना है कि करसोग अस्पताल में गायनी, आर्थो, शिशु विशेषज्ञ और रेडियोलॉजिस्ट के पद खाली चल रहे हैं. इस बारें में उच्च अधिकारियों को समय-समय पर अवगत करवाया जाता है. करसोग के विधायक व सीपीएस मनसाराम का कहना है कि करसोग में बेहतर स्वास्थ्य सेवायें देना पहला लक्ष्य है. हम सरकार से जल्द ही इन समस्याओं को हल करने के लिए कहेंगे. अब देखना होगा कि आखिर सरकार अपनी निंद्रा से कब जागती है और इस अस्पताल का सुध लेती है.
