नई दिल्ली. देश में दालों का उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से शुरू किए गए केंद्र सरकार के ‘मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पल्सेज’ (Mission for Aatmanirbharta in Pulses) के पहले साल में रिसर्च प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं मिल पाई है। छह साल के इस मिशन के लिए कुल 11,440 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है, जिसमें से 500 करोड़ रुपये अनुसंधान परियोजनाओं के लिए रखे गए हैं। हालांकि, वित्त वर्ष 2025-26 में मिशन का पहला साल पूरा होने के बावजूद इन परियोजनाओं को अब तक मंजूरी नहीं मिली है। मामले में देरी सामने आने के बाद कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने प्रक्रिया तेज करने की बात कही है।
कैबिनेट सचिवालय ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को निर्देश दिया था कि 15 नवंबर तक रिसर्च प्रोजेक्ट की मंजूरी से जुड़ी सभी प्रक्रियाएं पूरी कर ली जाएं। रविवार को मंत्रालय ने बताया कि इस प्रक्रिया में तेजी लाई जा रही है और समिति की सिफारिशों के आधार पर पात्र परियोजनाओं को अक्टूबर 2026 के अंत तक मंजूरी दिए जाने की उम्मीद है। यह समयसीमा कैबिनेट सचिवालय की ओर से तय 15 नवंबर की तारीख से पहले की है।
कैबिनेट सचिवालय ने उठाया परियोजनाओं में देरी का मुद्दा
5 अक्टूबर को कैबिनेट सचिव डॉ. टी.वी. सोमनाथन की अध्यक्षता में हुई बैठक में कृषि अनुसंधान को तिलहन, दालों और कपास की जरूरतों के अनुरूप बनाने की समीक्षा की गई थी। नई दिल्ली स्थित सेवा तीर्थ में आयोजित इस बैठक में कृषि सचिव अतिश चंद्रा, पर्यावरण सचिव नरेंद्र भूषण और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव मांगी लाल जाट सहित वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए थे।
बैठक के दौरान कैबिनेट सचिवालय के अधिकारियों ने राष्ट्रीय दलहन मिशन के अनुसंधान घटक के तहत प्रस्तावित परियोजनाओं को मंजूरी नहीं मिलने का मुद्दा उठाया। इसके बाद कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को 500 करोड़ रुपये के निर्धारित बजट के तहत परियोजनाओं की स्वीकृति की प्रक्रिया 15 नवंबर तक पूरी करने को कहा गया।
रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए मिले 419 प्रस्ताव
कृषि मंत्रालय के अनुसार, अनुसंधान के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने के बाद देशभर के शोध संस्थानों और अन्य पात्र संगठनों से प्रस्ताव आमंत्रित किए गए थे। इसके तहत कुल 419 प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिनकी स्क्रीनिंग और तकनीकी समीक्षा की जा रही है।
मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, इनमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थानों से 125 प्रस्ताव आए हैं। राज्य कृषि विश्वविद्यालयों ने 249 प्रस्ताव भेजे हैं, जबकि अन्य सरकारी विश्वविद्यालयों, संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से 14 प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। निजी विश्वविद्यालयों से भी पांच प्रस्ताव मिले हैं।
इन प्रस्तावों की जांच के लिए गठित स्क्रीनिंग समिति ने मिशन की प्राथमिकताओं और अनुसंधान की जरूरतों के आधार पर परियोजनाओं को छांटा है। चयनित प्रस्तावों को राष्ट्रीय स्तर की रिसर्च एंड डेवलपमेंट कमेटी के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। इस समिति में अतिरिक्त सचिव, ICAR के वरिष्ठ अधिकारी और वैज्ञानिक, मिशन से जुड़े अधिकारी तथा विषय विशेषज्ञ शामिल हैं।
समिति परियोजनाओं की वैज्ञानिक गुणवत्ता, किसानों के खेतों में उनके इस्तेमाल की संभावनाओं, संभावित लाभ और पहले से चल रहे शोध के साथ दोहराव जैसे पहलुओं का आकलन कर रही है। मंत्रालय के अनुसार, पिछली तीन बैठकों में कई प्रस्तावों को मंजूरी के लिए शॉर्टलिस्ट किया जा चुका है।
2025 में शुरू हुआ था आत्मनिर्भरता इन पल्सेज मिशन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्टूबर 2025 को इस मिशन की शुरुआत की थी। इससे पहले 1 अक्टूबर 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसे मंजूरी दी थी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2025 को बजट भाषण में इस योजना की घोषणा की थी।
वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक छह साल के लिए चलने वाले इस मिशन का कुल वित्तीय परिव्यय 11,440 करोड़ रुपये है। इसका उद्देश्य देश में दालों का उत्पादन बढ़ाकर घरेलू मांग को पूरा करना और किसानों की आय में सुधार करना है। मिशन के तहत जलवायु के अनुकूल बीजों का विकास और उनकी उपलब्धता, दालों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाना, उत्पादकता में सुधार, फसल कटाई के बाद भंडारण और प्रबंधन को बेहतर बनाना तथा किसानों को लाभकारी कीमत दिलाने पर जोर दिया गया है।
2030-31 तक दालों का उत्पादन 350 लाख टन करने का लक्ष्य
भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है, लेकिन घरेलू उत्पादन देश की सालाना जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी कमी को दूर करने के लिए सरकार ने दलहन मिशन शुरू किया है। मिशन के तहत वर्ष 2030-31 तक दालों का कुल उत्पादन 2023-24 के 242 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 350 लाख मीट्रिक टन करने का लक्ष्य रखा गया है। यह करीब 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी।
इसके अलावा, दालों की खेती का रकबा 275 लाख हेक्टेयर से बढ़ाकर 310 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य है, जो लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि होगी। औसत उत्पादकता को भी 881 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 1,130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक ले जाने की योजना है। इसके लिए बेहतर बीज, वैज्ञानिक अनुसंधान और खेती की आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण माना गया है।
पहले साल में उत्पादन और खेती के रकबे में बढ़ोतरी का दावा
कृषि मंत्रालय के मुताबिक, मिशन के पहले साल में दालों के खेती क्षेत्र, उत्पादन और उत्पादकता में सुधार दर्ज किया गया है। वर्ष 2025-26 के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, दालों की खेती का रकबा 2024-25 के 277.2 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 286.5 लाख हेक्टेयर हो गया। यह 3.3 प्रतिशत की वृद्धि है।
इसी अवधि में दालों का उत्पादन 256.8 लाख टन से बढ़कर 274.1 लाख टन पहुंच गया, जो 6.7 प्रतिशत अधिक है। वहीं, औसत उत्पादकता 926 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 957 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई। मंत्रालय ने इन आंकड़ों को मिशन के शुरुआती सकारात्मक परिणामों के रूप में पेश किया है।
हालांकि, अनुसंधान परियोजनाओं को मंजूरी मिलने में हुई देरी इस मिशन के एक अहम हिस्से की प्रगति पर सवाल खड़े करती है। अब कृषि मंत्रालय की ओर से अक्टूबर के अंत तक पात्र परियोजनाओं को मंजूरी देने की उम्मीद जताई गई है। इन परियोजनाओं पर काम शुरू होने के बाद ही यह आकलन किया जा सकेगा कि अनुसंधान के जरिए दालों की उत्पादकता बढ़ाने और किसानों को बेहतर लाभ दिलाने के लक्ष्य को किस हद तक हासिल किया जा सकता है।

