नई दिल्ली. देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) सेक्टर पर नकदी संकट लगातार गहराता जा रहा है। पब्लिक पॉलिसी थिंक टैंक Empower India की एक रिपोर्ट के अनुसार, जीएसटी के इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (IDS) के कारण अरबों रुपये का इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) रिफंड अटका हुआ है, जिससे छोटे कारोबारियों की कार्यशील पूंजी प्रभावित हो रही है। संगठन ने जीएसटी परिषद से आगामी बैठक में इस मुद्दे पर तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि रिफंड में देरी जारी रही तो कई छोटे उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच सकते हैं और लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
क्या है इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर
इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर ऐसी व्यवस्था है जिसमें कच्चे माल और सेवाओं पर लगने वाला जीएसटी, तैयार उत्पाद पर लगने वाले टैक्स से अधिक होता है। उदाहरण के तौर पर, निर्माता 18 प्रतिशत जीएसटी देकर कच्चा माल खरीदते हैं, जबकि तैयार उत्पाद केवल 5 प्रतिशत जीएसटी स्लैब में बिकता है। ऐसे में अतिरिक्त टैक्स राशि रिफंड के रूप में वापस मिलनी होती है, लेकिन इसमें महीनों की देरी हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2025 में जीएसटी दरों के पुनर्गठन के बाद खाद्य प्रसंस्करण, एफएमसीजी और फार्मा जैसे कई सेक्टरों के उत्पाद निचले टैक्स स्लैब में चले गए, जिससे इनपुट और आउटपुट टैक्स के बीच का अंतर और बढ़ गया।
MSME सेक्टर में 30 लाख करोड़ रुपये का क्रेडिट गैप
Empower India ने अनुमान लगाया है कि देश का MSME सेक्टर फिलहाल करीब 30 लाख करोड़ रुपये के क्रेडिट गैप का सामना कर रहा है। यह सेक्टर भारत की जीडीपी में लगभग 30 प्रतिशत योगदान देता है और 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है। संगठन के महानिदेशक K Giri ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट, बढ़ती लागत और सप्लाई चेन बाधाओं के बीच यह समस्या और गंभीर हो गई है। उन्होंने कहा कि भारत के छोटे उद्योग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन मौजूदा कर व्यवस्था उत्पादन करने वाले कारोबारों पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है।
फूड प्रोसेसिंग, ई-कॉमर्स और फार्मा सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित
रिपोर्ट के अनुसार, फूड प्रोसेसिंग उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। तैयार खाद्य उत्पादों पर केवल 5 प्रतिशत जीएसटी लगता है, जबकि पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और कोल्ड स्टोरेज सेवाओं पर 18 प्रतिशत टैक्स देना पड़ता है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले करीब 14 लाख छोटे विक्रेता भी इसी समस्या से जूझ रहे हैं। उन्हें प्लेटफॉर्म फीस, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स पर 18 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ता है, जबकि उनके उत्पाद 5 प्रतिशत टैक्स स्लैब में आते हैं। रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में भी लागत बढ़ रही है। सोलर और विंड पावर उपकरणों पर 5 प्रतिशत जीएसटी है, लेकिन स्टील, ग्लास और इंजीनियरिंग सेवाएं अब भी 18 प्रतिशत टैक्स दायरे में हैं। फार्मा और एफएमसीजी सेक्टर में भी जीएसटी 2.0 के बाद टैक्स असंतुलन का असर उत्पादन क्षमता, सप्लाई और रोजगार पर दिखने लगा है। उद्योग संगठन Pharmexcil ने भी इस संबंध में चिंता जताई है।
रिफंड सिस्टम में बताई गई खामियां
रिपोर्ट में कहा गया है कि CGST Act की धारा 54(3) के तहत केवल इनपुट गुड्स पर ITC रिफंड की अनुमति है, जबकि इनपुट सेवाओं और पूंजीगत वस्तुओं को इसमें शामिल नहीं किया गया है। ई-कॉमर्स और फूड प्रोसेसिंग जैसे सेक्टरों में सेवाओं की लागत काफी अधिक होती है, जिससे छोटे कारोबारियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
संगठन का कहना है कि इससे MSME इकाइयों को स्थायी लागत नुकसान झेलना पड़ रहा है और वे बड़े उद्योगों की तरह लागत संतुलित नहीं कर पा रहे हैं।
सरकार से की गई ये प्रमुख मांगें
Empower India ने सरकार से इनपुट सेवाओं और पूंजीगत वस्तुओं को भी रिफंड दायरे में शामिल करने, “नेट ITC” की परिभाषा में सभी इनपुट लागत जोड़ने, गंभीर टैक्स असंतुलन वाले सेक्टरों में जीएसटी दरों को तर्कसंगत बनाने और स्वचालित रिफंड प्रणाली लागू करने की मांग की है। इसके अलावा, संगठन ने IDS से जुड़े मामलों की निगरानी के लिए एक विशेष मॉनिटरिंग मैकेनिज्म बनाने का सुझाव भी दिया है, ताकि भविष्य में ऐसे टैक्स असंतुलनों की समय रहते पहचान की जा सके। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पंजाब, महाराष्ट्र और गुजरात के कई औद्योगिक क्लस्टरों में छोटे विनिर्माण इकाइयों को लंबित ITC रिफंड के कारण समय-समय पर उत्पादन रोकना पड़ रहा है।
