नई दिल्ली. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) द्वारा आयोजित नियंत्रक सम्मेलन में भारत की रक्षा क्षमताओं, बजट आवंटन और स्वदेशी रक्षा उत्पादों पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब समय सिर्फ कागजी-लेखा-जोखा का नहीं, बल्कि सुरक्षा पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाने का है।
नियंत्रक नहीं, राष्ट्र निर्माता बनिए
राजनाथ सिंह ने कहा कि आप नियंत्रक निश्चित रूप से हैं, लेकिन सोच को खुला और ईमानदार होना चाहिए। आप जिन फ़ाइलों को संसाधित करते हैं, उनका प्रभाव सीधे हमारी सीमाओं पर हमला करने वालों तक होता है। उन्हें आश्वस्त होना चाहिए कि उनके पीछे एक मजबूत प्रणाली खड़ी है। उन्होंने यह भी बताया कि रक्षा क्षेत्र में पट्टियाँ और तानाशाही योजना से ही रणनीतिक तैनाती संभव हो सकती है।
रक्षा बजट कई देशों की जीडीपी से बड़ा
रक्षा मंत्री ने बताया कि भारत का रक्षा बजट आज कई देशों की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) से अधिक है। जब जनता की मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा रक्षा मंत्रालय को दिया जाता है, तो हमारी जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। हमें सिर्फ खर्च नहीं, बल्कि प्रभावी उपयोग पर ध्यान देना होगा। उन्होंने GeM पोर्टल के माध्यम से पहली बार पूंजी खरीद की प्रारंभिक जानकारी को एक साहसिक और सुधारात्मक कदम बताया।
स्वदेशी हथियारों की वैश्विक मांग में उछाल
राजनाथ सिंह ने कहा कि हाल ही में ऑपरेशन सिन्दूर में भारत ने अपनी सेना और मेड इन इंडिया हथियारों की क्षमता का प्रदर्शन पूरी दुनिया को दिखाया। आज विश्व का सैन्य व्यय 2.7 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच गया है। इस तेजी से बढ़ते वैश्विक रक्षा बाजार में भारत के सबसे करीब गिरावट आई है।उन्होंने कहा कि विदेशी सेनाएं अब भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादों में समुद्री तट दिखा रही हैं।
वैश्विक सैन्य दौड़ में भारत का मजबूत कदम
रक्षा मंत्री ने रक्षा अर्थशास्त्र की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। आज का युग दिखावटी शांति का है, लेकिन अचानक कोई संकट हमें अवशेषों से राखवा करवा देता है। ऐसे समय में रसद, हथियार निर्माण और आपातकालीन खरीद पर हमारी तैयारी तय होती है कि हम कितने सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि हमें पूर्व-खाली रक्षा योजना और निवेश रणनीति पर काम करना होगा क्योंकि विश्व में एक बार फिर सैन्यीकरण की ओर तेजी से बढ़ रहा है। राजनाथ सिंह के इस बयान में भारत के रक्षा क्षेत्र में संरचनात्मक परिवर्तन, वित्तीय सुधार और रणनीतिक स्थिति को शामिल किया गया है। डीआरडीओ और उससे जुड़े सभी सहयोगियों को अब सिर्फ डेटा का प्रबंधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा वास्तुकला का आधार बनाना होगा।
