नई दिल्ली: भारत का दवा उद्योग वर्ष 2030 तक 120 से 130 अरब डॉलर के बाजार में बदल सकता है, लेकिन इसके लिए अनुसंधान, नवाचार, नियामक ढांचे और कुशल मानव संसाधन से जुड़ी चुनौतियों को दूर करना होगा। यह बात हेल्थ कॉन्वो की एक नॉलेज रिपोर्ट में कही गई है, जिसे एक उद्योग कार्यक्रम के दौरान जारी किया गया।
वैश्विक बदलावों से खुला बड़ा अवसर
रिपोर्ट के अनुसार, जैविक दवाओं (Biologics) के पेटेंट समाप्त होने, उन्नत उपचारों की बढ़ती मांग और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव के कारण भारत के लिए एक बड़ा अवसर पैदा हुआ है। वर्तमान में भारत दुनिया की करीब 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करता है और यूनिसेफ की वैक्सीन जरूरतों का लगभग 55 से 60 प्रतिशत हिस्सा पूरा करता है।
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का फार्मास्युटिकल निर्यात 30.46 अरब डॉलर तक पहुंच गया। रिपोर्ट का अनुमान है कि 2025 में लगभग 55 अरब डॉलर का घरेलू फार्मा बाजार दशक के अंत तक दोगुने से अधिक आकार का हो सकता है।
जेनेरिक से इनोवेशन आधारित मॉडल की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अनुकूल बाजार परिस्थितियां ही पर्याप्त नहीं होंगी। भारत को जेनेरिक दवाओं पर आधारित मौजूदा मॉडल से आगे बढ़कर नवाचार-आधारित फार्मा इकोसिस्टम विकसित करना होगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 से 2029 के बीच 40 अरब डॉलर से अधिक वार्षिक राजस्व वाली कई जैविक दवाओं के पेटेंट समाप्त होने वाले हैं। सवाल यह है कि क्या भारत का इकोसिस्टम इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए तैयार है।
पांच प्रमुख क्षेत्रों में सुधार जरूरी
रिपोर्ट में पांच प्रमुख प्राथमिकताओं की पहचान की गई है, जिन पर ध्यान दिए बिना भारत इस अवसर का पूरा लाभ नहीं उठा पाएगा। इनमें वैज्ञानिक शोध की वैश्विक पहचान बढ़ाना, उद्योग-अकादमिक-सरकार सहयोग को मजबूत करना, विशेष कौशल वाले दवा विकास विशेषज्ञ तैयार करना, नवाचार वित्तपोषण बढ़ाना और मरीजों तक नई दवाओं की पहुंच आसान बनाना शामिल है।
बायोसिमिलर और नई तकनीकों में बड़ा अवसर
भारतीय फार्मा उद्योग अब पारंपरिक जेनेरिक दवाओं से आगे बढ़कर बायोसिमिलर, बायोलॉजिक्स, सेल एवं जीन थेरेपी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित दवा खोज जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक बायोसिमिलर बाजार 2025 के 39.6 अरब डॉलर से बढ़कर 2033 तक 151.6 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। वहीं कैंसर उपचार संबंधी दवाओं पर वैश्विक खर्च 2029 तक 441 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
नियामक चुनौतियां बढ़ा रही हैं लागत
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की नियामक प्रणाली और अमेरिकी एवं यूरोपीय अनुमोदन प्रक्रियाओं के बीच अंतर के कारण दवा विकास में 18 से 30 महीने तक की अतिरिक्त देरी हो सकती है। इससे बायोसिमिलर दवाएं विकसित करने वाली कंपनियों की लागत प्रति उत्पाद 2 से 5 करोड़ डॉलर तक बढ़ सकती है।
प्रतिभा और कौशल की भी चुनौती
फार्मा क्षेत्र में कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की दर लगभग 35 प्रतिशत बताई गई है, जबकि स्नातक युवाओं की उद्योग के लिए तैयार रहने की दर केवल 58 प्रतिशत है। रिपोर्ट ने कम्प्यूटेशनल बायोलॉजी, क्लीनिकल रिसर्च, रेगुलेटरी साइंस और AI-सक्षम दवा विकास जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता बढ़ाने के लिए पांच वर्षीय कार्यक्रम शुरू करने की सिफारिश की है।
2030 तक 80 अरब डॉलर निर्यात का लक्ष्य
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की बायोइकोनॉमी 150 अरब डॉलर का आंकड़ा पार कर चुकी है और 2030 तक इसे 300 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। सरकार की बायोफार्मा शक्ति और बायो-राइड जैसी योजनाएं इस दिशा में मददगार साबित हो सकती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक यदि आवश्यक सुधार समय पर लागू किए जाते हैं तो 2030 तक भारत का फार्मा निर्यात 75 से 80 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है और देश वैश्विक फार्मास्युटिकल नवाचार का प्रमुख केंद्र बन सकता है।
