नई दिल्ली. दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा (Justice Yashwant Varma) एक बार फिर सुर्खियों में हैं। लुटियंस दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास से जली हुई नकदी (burnt cash in government accommodation) मिलने के मामले में गठित तीन जजों के जांच पैनल ने उन्हें “misconduct” यानी अनुचित व्यवहार का दोषी पाया है। यह रिपोर्ट उस आगजनी की घटना से जुड़ी है, जो 14 मार्च 2024 की रात को घटी थी और जिसमें उनके घर के स्टोर रूम से जली हुई नकदी से भरे बोरे (bags of burnt currency) बरामद हुए थे।
Panel Report Highlights: जस्टिस वर्मा पर गंभीर टिप्पणियां
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जी.एस. संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जज अनु शिवरामन द्वारा तैयार की गई इस 64-पन्नों की रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
रिपोर्ट में कहा गया है जब किसी जज को सरकारी आवास (government allotted house) दिया जाता है, तो यह उसकी जिम्मेदारी होती है कि वह उसे किसी भी संदिग्ध वस्तु या गतिविधि से मुक्त रखे। जली हुई नकदी कोई मामूली बात नहीं है और यह store room में बिना किसी अनुमति के नहीं रखी जा सकती थी।
‘Sitting Judge के घर में इतनी कैश रखना असंभव’: रिपोर्ट का दावा
पैनल ने कहा कि एक सिटिंग जज (sitting judge) के स्टोर रूम में इतनी नकदी का मौजूद होना न सिर्फ असंभव है, बल्कि सुरक्षा प्रोटोकॉल की निगरानी के कारण ये बात और संदेहास्पद हो जाती है।
“प्रत्येक सरकारी जज हाउस की सुरक्षा गार्ड्स और PSO द्वारा की जाती है। इसके अलावा जस्टिस वर्मा के निवास में 6 से अधिक स्टाफ क्वार्टर, पुराने नौकर और मजबूत निगरानी तंत्र मौजूद था। ऐसे में इतनी बड़ी नकदी को वहां छुपाना बिना जानकारी के मुमकिन नहीं लगता।”
CJI ने खुद गठित की थी जांच समिति
22 मार्च को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश CJI Sanjiv Khanna ने इस मामले की जांच के लिए समिति बनाई थी। 4 मई को इस high-level judicial panel ने रिपोर्ट सौंपते हुए जस्टिस वर्मा को अनुशासनहीनता और संदेहास्पद गतिविधि (judicial misconduct) का दोषी ठहराया। इसके बाद महाभियोग (impeachment proceedings) की सिफारिश तत्कालीन CJI द्वारा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को की गई।
Cross-examination की अनुमति नहीं, फिर भी हुआ निष्पक्षता का दावा
पैनल ने जस्टिस वर्मा, उनकी बेटी और 55 अन्य गवाहों से पूछताछ की। हालांकि cross examination और legal representation की अनुमति नहीं दी गई, फिर भी रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (principle of natural justice) का पालन किया गया।
स्टोर रूम से मिली नकदी पर क्या बोले विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर न्यायपालिका के उच्च पदों पर आसीन लोगों के खिलाफ इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं, तो यह ना केवल न्याय प्रणाली की साख को चोट पहुंचाती हैं बल्कि आम जनता में अविश्वास भी पैदा करती हैं।
