नई दिल्ली. सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत मिली जानकारी से खुलासा हुआ है कि कैबिनेट सचिवालय ने चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी की ओर से कैबिनेट सचिव को लिखे गए पत्रों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कार्यालय को भी भेजी थीं। इन पत्रों में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त (DEC) मनीष गर्ग पर कथित कदाचार के आरोपों का जिक्र किया गया था। सचिवालय ने ये पत्र कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भी भेजे थे।
RTI के जवाब में जारी दस्तावेजों के मुताबिक, 3 अगस्त को कैबिनेट सचिवालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इन पत्रों पर राय लेने का प्रस्ताव रखा था। वहीं, 4 अगस्त के एक अन्य नोट में कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने पत्र अपनी व्यक्तिगत हैसियत से लिखे थे, न कि भारत निर्वाचन आयोग की ओर से आधिकारिक संवाद के रूप में।
दस्तावेजों के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों को केवल पत्र मिलने की पुष्टि भेजी गई थी। 5 अगस्त को जारी इन स्वीकृति पत्रों की प्रतियां DoPT के सचिव, विभाग के स्थापना अधिकारी और मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रधान निजी सचिव को भी भेजी गई थीं।
कैबिनेट सचिवालय ने मामले में क्या कदम उठाए?
3 अक्टूबर को अपनी रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों के पत्रों और उन्हें DoPT भेजे जाने की जानकारी दी थी। हालांकि, RTI से सामने आए दस्तावेजों में यह भी पता चला कि पत्रों की प्रतियां CEC ज्ञानेश कुमार के कार्यालय को भेजी गई थीं।
अखबार की पहले की रिपोर्ट के मुताबिक, कैबिनेट सचिव ने इन पत्रों पर कोई कार्रवाई नहीं की थी, क्योंकि वे भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक ओर से नहीं, बल्कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने व्यक्तिगत हैसियत से लिखे थे।
RTI के जवाब में कैबिनेट सचिवालय के सूचना अधिकारी ने कार्रवाई से जुड़े सवाल के जवाब में पत्र प्राप्त होने की पुष्टि और संबंधित अधिकारियों को भेजे गए दस्तावेजों का ब्योरा दिया।
संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप की आशंका
पारदर्शिता कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश बत्रा को RTI कानून के तहत उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में 4 अगस्त का एक नोट भी शामिल है। इसमें कैबिनेट सचिवालय ने आगाह किया कि मामले में उठाया गया कोई भी कदम ऐसी कार्रवाई के रूप में देखा जा सकता है, जिसे संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप माना जाए।
नोट में यह भी सुझाव दिया गया कि संबंधित अधिकारी मनीष गर्ग के बारे में भविष्य में निर्णय लेने के लिए इस मामले को DoPT के रिकॉर्ड में रखा जाए।
लोकेश बत्रा ने इस संबंध में 24 सितंबर को RTI आवेदन दाखिल किया था।
29 जुलाई को लिखे गए थे दोनों पत्र
चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को लगभग समान पत्र भेजे थे। संधू के पत्र के साथ मनीष गर्ग की ओर से 28 जुलाई को जारी कार्य आवंटन आदेश की प्रति भी संलग्न थी।
इस आदेश में गर्ग ने अपने और निर्वाचन आयोग के अन्य अधिकारियों के बीच कामकाज का बंटवारा किया था। इनमें महानिदेशक (IT) सीमा खन्ना और उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार भी शामिल थे।
IT विभाग की फाइलों के रूटिंग सिस्टम को लेकर था विवाद
हिंदुस्तान टाइम्स की 3 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्ति मनीष गर्ग के उस फैसले को लेकर थी, जिसके तहत IT विभाग की फाइलों को भेजने की प्रक्रिया में बदलाव किया गया था। यह विभाग सीमा खन्ना के अधीन था। पहले इन फाइलों को उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार के पास भेजा जाता था।
कैबिनेट सचिव को लिखे गए गोपनीय पत्रों में संधू और जोशी ने बताया था कि 28 जुलाई को गर्ग को प्रशासनिक प्रभाग (Administration Division) का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। उस समय उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु 9 अगस्त तक छुट्टी पर थे।
पत्रों के मुताबिक, अतिरिक्त प्रभार मिलने के कुछ ही घंटों के भीतर गर्ग ने अधिकारियों के कार्य आवंटन से संबंधित आदेश जारी कर दिया। इसमें उनके वरिष्ठ और उनके समकक्ष स्तर के अधिकारी भी शामिल थे। दोनों चुनाव आयुक्तों ने आरोप लगाया कि इस फैसले से पहले उनसे परामर्श नहीं किया गया था।
दोनों ने अपने पत्रों में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18(1) और 18(2) का भी उल्लेख किया था। विवेक जोशी ने यह भी कहा था कि प्रशासनिक प्रभाग से मांगी गई एक फाइल उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई।
मतदाता सूची के IT सिस्टम को लेकर भी विवाद
इन पत्रों और RTI से सामने आई जानकारी का महत्व ऐसे समय में बढ़ गया है, जब निर्वाचन आयोग के IT सिस्टम को लेकर भी विवाद सामने आया है।
द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, सीमा खन्ना की ओर से लागू किए गए और निर्वाचन आयोग द्वारा मंजूर नए IT प्रोटोकॉल या सिस्टम के कारण मतदाताओं के डेटाबेस यानी मतदाता सूची तक उन अधिकारियों की पहुंच बाधित हो गई थी, जो नाम जोड़ने या हटाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। इन अधिकारियों को Electoral Registration Officers (EROs) कहा जाता है।
रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेदों का भी जिक्र किया गया था। इसके मुताबिक, विवेक जोशी और सुखबीर संधू ने कई मौकों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से असहमति जताई थी।
हालांकि, भारत निर्वाचन आयोग ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा था कि सभी निर्णय नियमों के अनुसार या तो सर्वसम्मति से लिए गए या बहुमत के आधार पर किए गए।

