नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को विजयादशमी समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि पश्चिमी देशों से ऐसी ताकतों का प्रभाव बढ़ रहा है, जो सांस्कृतिक परंपराओं, मानवीय मूल्यों और समाज की एकता को नुकसान पहुंचाना चाहती हैं। उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल का उदाहरण देते हुए कहा कि इन देशों में जो कुछ हो रहा है, उसके पीछे ऐसी ताकतों की भूमिका है। भागवत ने दावा किया कि भारत भी उनके निशाने पर है और देश को कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि केवल सत्ता परिवर्तन से परिस्थितियां नहीं बदलतीं। भारत में मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट नीतियों और नई पीढ़ी में देश के प्रति बढ़ते गौरव के कारण ऐसी कोशिशों को कामयाब नहीं होने दिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ताकतें भारत, हिंदू समाज और संघ को तोड़ने का प्रयास कर रही हैं। इसके लिए उन्हें समान विचारधारा वाले लोगों और महत्वाकांक्षी नेताओं का सहयोग भी मिलता है।
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे विशाल और विकासशील देश में चुनौतियां बनी रहती हैं। लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना जरूरी है, लेकिन उनका उद्देश्य समस्याओं का समाधान होना चाहिए। प्रदर्शन करने वाले समूहों, कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों और राजनीतिक नेताओं को ऐसे कदमों से बचना चाहिए, जिनसे समाज में संघर्ष, नफरत, कड़वाहट या विभाजन पैदा हो। भावनाएं कितनी भी तीव्र क्यों न हों, सभी को संविधान, कानून और नागरिक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।
ओटीटी कंटेंट पर नियंत्रण की जरूरत
मोहन भागवत ने युवाओं पर डिजिटल माध्यमों के प्रभाव का जिक्र करते हुए ओटीटी (OTT Content Regulation) पर प्रसारित होने वाली सामग्री को नियंत्रित करने की आवश्यकता भी जताई। उनका कहना था कि युवा बिना किसी विवेकपूर्ण चयन के विभिन्न प्रकार की सामग्री देख रहे हैं। उन्होंने भारत की विविधता को देश की पारंपरिक पहचान बताते हुए कहा कि अलग-अलग भाषाओं, समुदायों और पंथों को स्वीकार करना तथा उनकी रक्षा करना भारतीय संस्कृति का स्वभाव रहा है। उन्होंने संत रविदास का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी आक्रमणकारियों के अत्याचार और धार्मिक उत्पीड़न के दौर में संत रविदास ने अपने धर्म के प्रति निष्ठा, सामाजिक सद्भाव और भक्ति का संदेश दिया। अपने जीवन के उदाहरण से उन्होंने उस समय के समाज में आत्मविश्वास जगाया और लोगों को अपनी परंपराओं व मूल्यों पर अडिग रहने की प्रेरणा दी।
संघ के शताब्दी वर्ष में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए
RSS प्रमुख ने बताया कि संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर पिछले एक साल में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। विजयादशमी का यह समारोह उन्हीं कार्यक्रमों के समापन का अवसर है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष संत रविदास जी महाराज की 650वीं जयंती मनाई जा रही है। इसके साथ ही आर्य समाज के प्रमुख संन्यासी, शिक्षाविद् और स्वतंत्रता सेनानी स्वामी श्रद्धानंद की शहादत के शताब्दी वर्ष का भी उल्लेख किया। स्वामी श्रद्धानंद ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया था और शुद्धि आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी। भागवत ने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती महाराज की जन्म शताब्दी का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने ओडिशा के जनजातीय समुदायों के बीच अपना जीवन समर्पित किया और लोगों को अपनी आस्था की रक्षा के प्रति जागरूक करने का काम किया। इसके अलावा, महात्मा ज्योतिराव फुले की 200वीं जयंती वर्ष की शुरुआत 11 अप्रैल से होने और बंगाल के श्रीमद राजनारायण बसु की 200वीं जयंती वर्ष का भी उल्लेख किया गया।
राष्ट्रीय पहचान और आत्मनिर्भरता पर दिया जोर
मोहन भागवत ने कहा कि इन महान व्यक्तित्वों को याद करना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि RSS पिछले 100 वर्षों से देश में राष्ट्रीय पहचान की भावना को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति और इतिहास में निहित यह प्रयास देश को संगठित, मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से किया जा रहा है। उनके मुताबिक, भारतीय परंपरा ने हमेशा विविधताओं को अपनाने और सभी की रक्षा करने का संदेश दिया है।
समय के साथ जीवन में बदलाव जरूरी है, लेकिन शाश्वत सिद्धांतों और मूल्यों को सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा, समुदाय या पंथ के प्रति लगाव स्वाभाविक है, लेकिन इन सबसे ऊपर भारत की साझा पहचान और भावनात्मक एकता होनी चाहिए। भागवत ने कहा कि अतीत में समाज ने खुद को छोटी-छोटी सीमाओं में बांध लिया, जिससे उसका सामूहिक सामर्थ्य कमजोर हुआ। अब लोगों को अपनी वास्तविक पहचान को समझते हुए आपसी सहयोग और एकता के साथ आगे बढ़ना चाहिए, ताकि पूरे समाज का कल्याण हो सके।
