नई दिल्ली. वन नेशन, वन इलेक्शन को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव पर विचार कर रही Joint Parliamentary Committee (JPC) की बैठक में सोमवार को इस मुद्दे पर अहम चर्चा हुई। JPC के चेयरमैन पीपी चौधरी ने कहा कि समिति अब तक जिन stakeholders से बातचीत कर चुकी है, उनमें से करीब 99 फीसदी लोग simultaneous elections के प्रस्ताव के समर्थन में हैं। उनके बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि अगर राजनीतिक सहमति बनती है तो One Nation, One Election को 2029 में ही लागू किया जा सकता है।
2029 में साथ हो सकते हैं Lok Sabha और Assembly Elections
JPC चेयरमैन पीपी चौधरी ने कहा कि यदि पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति और सहमति मौजूद रहती है तो One Nation, One Election व्यवस्था को 2029 से लागू किया जा सकता है। इसका मतलब होगा कि लोकसभा के साथ देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव भी एक ही समय पर कराए जाएंगे।
फिलहाल समिति 129th Constitution Amendment Bill की जांच कर रही है। यह विधेयक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने के लिए संवैधानिक व्यवस्था तैयार करने से जुड़ा है। 2029 की संभावित समयसीमा की चर्चा ने इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
JPC बैठक में कई विपक्षी नेता भी शामिल
सोमवार को हुई JPC बैठक में समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी के अलावा कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम, TMC सांसद सागरिका घोष और NCP (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले सहित कई सदस्य मौजूद रहे।
विपक्षी दलों की ओर से One Nation, One Election का विरोध किया जाता रहा है। विपक्ष का तर्क है कि एक साथ चुनाव कराने से राज्यों की राजनीतिक स्वायत्तता और federal structure पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा सरकार गिरने या किसी विधानसभा का कार्यकाल समय से पहले खत्म होने की स्थिति में चुनावी व्यवस्था को लेकर भी कई संवैधानिक सवाल उठाए जा रहे हैं।
पीपी चौधरी ने क्या कहा?
JPC चेयरमैन पीपी चौधरी ने कहा कि समिति ने अब तक बड़ी संख्या में stakeholders से विचार-विमर्श किया है और उनमें से भारी बहुमत simultaneous elections के पक्ष में है। उनके मुताबिक करीब 99 फीसदी stakeholders ने One Nation, One Election के समर्थन में राय दी है।
उन्होंने यह भी बताया कि बैठक में पी. चिदंबरम ने अपने राजनीतिक दल का पक्ष समिति के सामने रखा। हालांकि विपक्षी दलों की आपत्तियां अभी भी इस प्रस्ताव के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
भारत में पहले भी होते थे एक साथ चुनाव
भारत में simultaneous elections की व्यवस्था कोई नई अवधारणा नहीं है। देश के पहले आम चुनाव 1952 में लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ कराए गए थे। इसके बाद 1957 और 1962 में भी यह व्यवस्था जारी रही। वर्ष 1967 में भी लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनाव साथ हुए थे।
हालांकि 1967 के बाद कई राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग हुईं और कुछ जगह President’s Rule लागू हुआ। इसके बाद चुनावों का चक्र अलग-अलग हो गया। 1972 में लोकसभा चुनाव भी तय समय से पहले कराए गए, जिसके बाद देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे।
अब One Nation, One Election का प्रस्ताव इसी पुराने synchronized election cycle को दोबारा लागू करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
One Nation, One Election क्यों लाना चाहती है सरकार?
इस व्यवस्था के समर्थकों का कहना है कि देश में बार-बार होने वाले चुनावों के कारण सरकारी मशीनरी और सार्वजनिक संसाधनों का बड़ा हिस्सा चुनावी प्रक्रिया में लग जाता है। बार-बार Model Code of Conduct लागू होने से कई सरकारी फैसलों और development projects की गति भी प्रभावित होने का दावा किया जाता है।
इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और अन्य अधिकारियों की चुनावी ड्यूटी लगने से उनके नियमित काम पर भी असर पड़ सकता है। समर्थकों का मानना है कि अगर चुनाव एक साथ कराए जाएं तो प्रशासनिक कामकाज में व्यवधान कम होगा और सरकार लंबे समय तक नीतियों तथा विकास योजनाओं पर ध्यान दे सकेगी।
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी लगातार चुनावों को development की राह में बाधा बताते हुए simultaneous elections के समर्थन में अपनी बात रखी है।
विपक्ष की सबसे बड़ी आपत्तियां क्या हैं?
विपक्षी दलों का कहना है कि संविधान के अनुसार विधानसभा और लोकसभा का कार्यकाल पांच साल का होता है। ऐसे में यदि किसी राज्य की सरकार दो या तीन साल में ही गिर जाती है तो One Nation, One Election व्यवस्था में आगे क्या होगा, यह बड़ा सवाल है।
विपक्ष यह भी सवाल उठा रहा है कि किसी सरकार के समय से पहले गिरने की स्थिति में क्या अगले चुनाव तक President’s Rule लगाया जाएगा। विपक्ष के अनुसार ऐसा करना लोकतांत्रिक और संवैधानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। वहीं किसी राज्य में केवल तीन साल के कार्यकाल के लिए विधानसभा चुनाव कराना भी मतदाताओं और राजनीतिक दलों के लिए उचित नहीं माना जा सकता।
One Nation, One Election से क्या फायदे बताए जा रहे हैं?
समर्थकों के अनुसार simultaneous elections लागू होने से देश को कई स्तरों पर फायदा हो सकता है। बार-बार चुनाव होने से होने वाला खर्च कम हो सकता है और सरकारी मशीनरी को बार-बार चुनावी ड्यूटी में लगाने की जरूरत घट सकती है।
इसके अलावा development projects और सरकारी योजनाओं के implementation में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। प्रस्ताव के समर्थकों का दावा है कि इससे GDP Growth में करीब 1.5 फीसदी तक की वृद्धि और inflation में लगभग 0.50 percentage points की कमी आ सकती है। हालांकि इन आर्थिक अनुमानों को लेकर अलग-अलग विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों की राय हो सकती है।
2029 में चुनाव कराने पर कई राज्यों का कार्यकाल घट सकता है
यदि One Nation, One Election को 2029 में लागू किया जाता है तो सबसे बड़ी चुनौती कई राज्यों के मौजूदा Assembly Terms को लोकसभा चुनाव के साथ align करना होगी।
2028 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। सामान्य स्थिति में इन राज्यों में चुनी जाने वाली विधानसभाओं का कार्यकाल 2033 तक रहेगा। लेकिन 2029 में simultaneous elections कराने की स्थिति में इनके कार्यकाल में बड़ी कटौती करनी पड़ सकती है।
2027 में चुनाव वाले राज्यों पर भी पड़ेगा असर
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, गुजरात, मणिपुर, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों में चुनी जाने वाली सरकारों का सामान्य कार्यकाल 2032 तक होगा। लेकिन अगर 2029 में One Nation, One Election लागू होता है तो इन राज्यों में विधानसभा चुनाव सामान्य समय से करीब तीन साल पहले कराने पड़ सकते हैं।
यह बदलाव Election Synchronisation की प्रक्रिया को लागू करने के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन इससे राज्यों की मौजूदा विधानसभा अवधि कम करने को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक बहस भी तेज हो सकती है।
2026 में चुनाव वाले राज्यों को भी देना पड़ सकता है समय से पहले वोट
तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में 2026 में विधानसभा चुनाव हुए हैं। इन राज्यों की मौजूदा विधानसभाओं का कार्यकाल सामान्य तौर पर 2031 तक चलना है। अगर 2029 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं तो इन राज्यों के मतदाताओं को करीब दो साल पहले ही दोबारा मतदान करना पड़ सकता है।
इसी तरह दिल्ली और बिहार में 2025 में विधानसभा चुनाव हुए थे और वहां मौजूदा सरकारों का कार्यकाल 2030 तक है। 2029 में simultaneous elections होने पर इन दोनों जगहों पर भी चुनाव निर्धारित समय से करीब एक साल पहले कराने की जरूरत पड़ सकती है।
कुछ राज्यों में 2029 का चुनाव चक्र पहले से तैयार
वहीं कुछ राज्यों में लोकसभा और विधानसभा चुनावों का समय पहले से ही करीब है। महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के कुछ समय बाद होते हैं। आंध्र प्रदेश, ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव पहले से ही साथ कराए जाते हैं।
इसलिए इन राज्यों को 2029 के simultaneous election cycle में शामिल करना तुलनात्मक रूप से आसान हो सकता है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल One Nation, One Election को लेकर अंतिम फैसला नहीं हुआ है। JPC प्रस्ताव और संबंधित संविधान संशोधन विधेयक की जांच कर रही है। समिति की रिपोर्ट, राजनीतिक दलों के बीच सहमति और संसद में विधायी प्रक्रिया के बाद ही यह तय होगा कि simultaneous elections कब और किस रूप में लागू किए जा सकते हैं।
JPC चेयरमैन के 2029 को लेकर दिए गए बयान ने जरूर इस संभावना को मजबूत किया है कि सरकार और समिति अब 2034 के बजाय 2029 Election Cycle को लेकर गंभीरता से विचार कर रही हैं। हालांकि अंतिम रूप से यह व्यवस्था तभी लागू होगी जब जरूरी संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रियाएं पूरी होंगी।
