पद्मावती… मुद्दों की रिंग में बयानों की कुश्ती या विरोध का ‘कोलावेरी डी’

रंगबिरंगी तड़क-भड़क लाइट्स, आतिशबाजी, फड़कती मसल्स, उभरे कंधे और ग्लैमर के तड़के के साथ कुश्ती की एक अजीबोगरीब प्रतियोगिता खूब प्रसिद्ध है. नाम कभी WWF हुआ करता था, बाद में फेडरेशन का ‘F’ बदलकर एंटरटेनमेंट का ‘E’ हो गया. इसके चाहने वालों की फेहरिस्त लंबी है, युवा इसके पहलवानों के नाम जुबानी याद कर बैठे हैं और उनकी ताकत पर चर्चा करते मिल जाते हैं. किशोर इनके कार्ड्स जुटाकर रखते हैं, और पहलवानों की हार-जीत पर खुशी गम भी जताते हैं.

इसकी रिंग भी खूब है. पहलवानों में जोर-आजमाइश तो है ही, जुबानी जंग भी खूब होती है. गालियां-धमकियां और अश्लील प्रदर्शन इसके ‘बिकाऊ’ होने की गारंटी हैं. जानकार कहते हैं कि प्रतियोगिता में काफी पैसा है. कुछ ‘ज्यादा’ जानकार कहते हैं कि यह सब दिखावा है, पहलवान एक-दूसरे से भिड़ने का नाटक करते हैं और जनता का मनोरंजन होता है. हालांकि चाहने वाले इसके जवाब में ऐसे मैचेज का उदाहरण देते हैं जहां रिंग में खून की नदिया बहीं और कई बार प्रतियोगियों को जान से हाथ भी धोना पड़ा. बहस-मुबाहिसे जारी हैं, इस रिंग में ग्रेट खली जैसे भारत के भी कुछ पहलवान ताल ठोंकते रहते हैं…

रिंग और भारत की चर्चा हुई तो देश की बौद्धिक रिंग में भी इन दिनों एक नूराकुश्ती पूरी दमदारी से चल रही है, उसपर भी चर्चा कर लेते हैं. ये कुश्ती है सिनेमा बनाने वालों और संस्कृति-मर्यादा के झंडाबरदारों में…

पद्मावती…संजय लीला भंसाली की ख्याति एक ऐसे निर्देशक के रूप में हो चली है जो अपनी फिल्मों में रंगों का खूब इस्तेमाल करते हैं. ‘हम दिल दे चुके सनम’ से चलते हुए ‘सांवरिया’, ‘रामलीला’ आदि फिल्मों से उन्होंने इस छवि को और पुख्ता किया. अब के रंग फीके हो चुके हैं इसलिए रंगों की तलाश में उन्हें इतिहास को खंगालना था, खंगाला तो मिलीं रानी पद्मावती.

कम से कम तीन साल से यह फिल्म, इसकी स्टार-कास्ट, कहानी आदि पर कयासबाजी चल रही थी…अचानक एक रोज खबरें आती हैं कि चित्तौड़ के किले में करणी सेना ने धावा बोला, भंसाली को पीटा, तोड़फोड़ और आगजनी की. समझने वाले समझ गए कि एक रिंग तैयार हो चुकी है, अब इसमें पहलवानों के करतब देखने को मिलेंगे, आड़े-टेढ़े बयान भी खूब बिकेंगे.

हुआ भी यूं ही, दीपिका की नाक के दाम 5 करोड़ लग गए तो भंंसाली के सिर की कीमत 10 करोड़. विवाद में राजपूत के नाम पर रणदीप हुड्डा नाहक घसीट लिए गए, उन्हें सफाई देनी पड़ी कि मैने सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट नहीं लिखा. ‘करणी सेना’ जिसके चरित्र के बारे में ‘गोरक्षकों’ जैसी कहानियां और जाहिर है किंवदंतियां भी प्रचलित थीं. उस ‘करणी सेना’ के लिए यह मुद्दा सम्मान की लड़ाई बन गया.

सम्मान की लड़ाइयों के लिए एक पुराना और कारगर नुस्खा है, इन्हें मजबूती देने के लिए इन्हें अक्सर किसी धर्म, संप्रदाय या जाति का रंग दिया जाता है, सो इस बार भी दिया गया. फिल्म में रानी पद्मावती को नाचते दिखाना, या अपने पति का आलिंगन करना एक जाति विशेष का अपमान माना गया. फिल्म में रानी के कॉस्ट्यूम में पेट दिखने को भी अनैतिक कहा गया जो भारत में महिलाओं के सर्वमान्य परिधान साड़ी में हमेशा से दिखता रहा है.

सिनेमा हाल जलाने, गर्दन काटने, टांग तोड़ने जैसे बयानों का प्रक्षेपण जारी था कि राजस्थान की मुख्यमंत्री ने पत्र लिखा कि बिना फेरबदल के अपने राज्य में वह फिल्म रिलीज नहीं होने देंगी. वही मुख्यमंत्री, जिनके एक काले कानून का एक मीडिया हाउस मुखर विरोध कर रहा है. बाकी भी कर रहे हैं मगर दबी जुबान में!! मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का भी बयान इसी बीच आ गिरा. उन्होंने ऐलान कर दिया कि सेंसर बोर्ड पास कर दे तो भी वे अपने प्रदेश में फिल्म रिलीज नहीं होने देंगे, यह वही मुख्यमंत्री हैं एक समय प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी को सीधी टक्कर भी दे रहे थे. जिन्होंने व्यापम घोटाले में देशव्यापी विरोध ‘हंसते-हंसते’ झेल लिया. हाल में एमपी की सड़कों को अमेरिका से बेहतर बताकर फिर से चर्चा में आए थे.

बयान अभी और भी आने हैं, आएंगे भी मगर गौर करें कि इन दो प्रदेशों में चुनाव ‘सिर पर’ आ चुके हैं. जाहिर है वोट-बैंक, कास्ट एनालिसिस और मुद्दों पर उनके ‘थिंक टैंक’ ने काम शुरू कर दिया होगा. देश में पार्टी और संगठन विशेष पर हिंदू-मुसलिम को तोड़ने के आरोप लगते हैं. एक और चर्चित नेता है यूपी के, आजम खान. अपने तीखे बयानों के लिए पहचाने जाने वाले आजम ने भी मौका देखा और बयान दिया कि ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म का उनकी कौम ने कोई विरोध नहीं किया जबकि उसमें एक कनीज को शहजादे की प्रेयसी दिखा-बता दिया गया था.

इस देश में अमूमन तीन प्रजातियां देखने को मिलती हैं. ‘जानकार’ वह है जो हर चीज की जानकारी रखता है, उसने तमाम ऐतिहासिक तथ्यों के बलबूते तर्क दिया कि फिल्म में गलत बातें दिखाई गई हैं. हर चीज की अंतर्कथा जानने वाले को भूत-भविष्य-वर्तमान का ‘द्रष्टा’ कह सकते हैं, उसने कहा कि यह दरअसल करणी सेना और फिल्म के निर्माताओं की मिलभगत है, फिल्म को बेचने का एक हथकंडा है…

एक तीसरी प्रजाति भी है, वह है ‘आम आदमी’ बेहद भोलाभोला, रोजी-रोटी के चक्कर में धक्के खाता हुआ या फिर किसी संगठन-नेता के झंडे-बैनर ढोता हुआ. दोनों ही स्थितियों में वह सिर खुजा रहा है, परेशान है कि यह माजरा क्या है. विरोध का मंतव्य भी विरोध ही है या कुछ और… अभिनेता रजनीकांत के दामाद हैं, धनुष. उनका एक गीत खूब चला मगर मतलब शायद ही समझ पाया हो कोई. पद्मावती का मामला भी कुछ ऐसा ही है… यह विरोध का ‘कोलावेरी डी’ है. देखते रहिए, मजा लेते रहिए, गुनगुनाते रहिए…