नई दिल्ली. Rajasthan Local Body Election: राजस्थान में आगामी Urban Local Body Elections को लेकर राजनीतिक हलचल बढ़ने लगी है। चुनावी तैयारियों के साथ ही राजनीतिक दलों में टिकट और संभावित उम्मीदवारों को लेकर मंथन शुरू हो गया है। लेकिन इस बार निकाय चुनाव में एक ऐसा कानूनी प्रावधान भी चर्चा में है, जिसके तहत किसी व्यक्ति का पहले पार्षद चुना जाना जरूरी नहीं है। यानी कोई व्यक्ति बिना Councillor Election जीते भी सीधे महापौर, सभापति या अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बन सकता है।
यह नियम राजनीतिक दलों के लिए खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसके जरिए वे चुनाव के बाद किसी प्रभावशाली नेता या लोकप्रिय चेहरे को निकाय के शीर्ष पद पर उतार सकते हैं।
पार्षद बने बिना कैसे लड़ सकते हैं मेयर या अध्यक्ष का चुनाव?
राजस्थान के मौजूदा नियमों के अनुसार, महापौर, सभापति या निकाय अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के लिए निर्वाचित पार्षद होना अनिवार्य नहीं है। हालांकि, उम्मीदवार को पार्षद पद के चुनाव के लिए निर्धारित Legal Eligibility और अन्य जरूरी योग्यताएं पूरी करनी होती हैं।
ऐसा उम्मीदवार सीधे Mayor, Chairman या President पद के लिए चुनाव लड़ सकता है। इसके बाद उसके पक्ष में मतदान सदन में निर्वाचित पार्षद करते हैं। यानी जनता सीधे उस व्यक्ति को महापौर या अध्यक्ष के रूप में नहीं चुनती, बल्कि निर्वाचित पार्षद वोटिंग के जरिए शीर्ष पद का चुनाव करते हैं।
2019 में गहलोत सरकार ने बदला था नियम
इस व्यवस्था की शुरुआत वर्ष 2019 में तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में हुए नियम संशोधन के बाद हुई थी। राजस्थान नगरपालिका (निर्वाचन) नियमों में बदलाव करते हुए महापौर या निकाय अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के लिए निर्वाचित पार्षद होने की अनिवार्यता हटा दी गई थी।
इस बदलाव के बाद किसी ऐसे व्यक्ति के लिए भी निकाय के शीर्ष पद तक पहुंचने का रास्ता खुल गया, जिसने पार्षद का चुनाव नहीं लड़ा हो।
BJP ने किया था विरोध, सत्ता में आने के बाद भी नियम जारी
जब कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2019 में इस प्रावधान को लागू किया था, तब BJP ने इसका विरोध किया था। भाजपा का तर्क था कि निकाय के शीर्ष पद पर ऐसे व्यक्ति को पहुंचने का अवसर नहीं मिलना चाहिए, जो खुद पार्षद के तौर पर निर्वाचित नहीं हुआ हो।
हालांकि, वर्ष 2023 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद भी इस प्रावधान को समाप्त नहीं किया गया। ऐसे में वर्तमान में यह नियम लागू है और आगामी निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों इसका राजनीतिक लाभ उठा सकते हैं।
बड़े नेताओं की हो सकती है वापसी
इस नियम का सबसे बड़ा राजनीतिक असर उन नेताओं पर पड़ सकता है, जो विधानसभा या लोकसभा चुनाव में हार चुके हैं, लेकिन अपने क्षेत्र में अभी भी मजबूत Political Influence रखते हैं।
अगर किसी पार्टी को निकाय चुनाव के बाद बहुमत हासिल होता है, तो वह अपने किसी वरिष्ठ नेता या प्रभावशाली चेहरे को सीधे महापौर या अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बना सकती है। इसके लिए उस नेता का पार्षद चुना जाना जरूरी नहीं होगा।
Jaipur, Jodhpur और Kota जैसे शहरों में बढ़ सकती है दिलचस्पी
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक यह व्यवस्था खास तौर पर बड़े शहरों में राजनीतिक दलों के लिए रणनीतिक विकल्प उपलब्ध कराती है। स्थानीय स्तर पर गुटबाजी, टिकट विवाद या चुनावी समीकरणों के कारण कई बार बड़े नेता पार्षद का चुनाव लड़ने से बचते हैं।
ऐसी स्थिति में पार्टी चुनाव परिणाम आने के बाद बहुमत के आधार पर किसी Senior Leader या Popular Face को महापौर अथवा अध्यक्ष पद पर उतार सकती है। यही वजह है कि आगामी राजस्थान निकाय चुनाव में पार्षदों के टिकट के साथ-साथ मेयर और अध्यक्ष पद के संभावित चेहरों को लेकर भी राजनीतिक हलचल तेज हो सकती है।

