नई दिल्ली. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट जल्द सुनवाई करेगा। सोमवार को वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने मामले की जल्द सुनवाई की मांग रखी। कोर्ट ने याचिका को अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है।
याचिका में CEC के निलंबन समेत कई मांगें
राकेश कुमार सिंह की ओर से संविधान के Article 32 के तहत दायर याचिका में मांग की गई है कि चुनाव आयोग को संविधान के Article 324 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल आयोग के सामूहिक निर्णय के आधार पर किया जाए और इन्हें अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा इस्तेमाल न किया जा सके। याचिका में लंबित मामले के दौरान ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर कार्य करने से रोकने की मांग भी की गई है। इसके अलावा quo warranto की रिट जारी करने का अनुरोध किया गया है, जिसके तहत यह पूछा गया है कि उन्होंने आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल व्यक्तिगत रूप से किस अधिकार के तहत किया।
SIR को लेकर भी उठाए गए सवाल
याचिका का एक प्रमुख हिस्सा Special Intensive Revision (SIR) से संबंधित है। याचिकाकर्ता का दावा है कि SIR से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर चुनाव आयोग के दो अन्य सदस्यों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की ओर से आपत्तियां दर्ज की गई थीं।
याचिका के अनुसार, अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच ऐसे कम से कम 14 मामलों में आपत्तियां दर्ज की गईं, जिनमें संबंधित चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर कहा कि फैसले आयोग की मंजूरी के बिना लिए गए थे। ये याचिका में किए गए दावे हैं, जिनकी सत्यता और कानूनी प्रभाव का निर्धारण अभी अदालत में होना है।
Section 18 का भी दिया गया हवाला
याचिकाकर्ता ने Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की Section 18 का हवाला दिया है। याचिका के मुताबिक इस प्रावधान में आयोग के कामकाज और फैसलों को लेकर सर्वसम्मति को प्राथमिकता दी गई है और मतभेद की स्थिति में फैसला बहुमत के आधार पर किए जाने की व्यवस्था है। इसी आधार पर याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग के नाम से जारी किसी आदेश, निर्देश या अन्य कार्रवाई को आयोग का निर्णय तभी माना जाना चाहिए, जब वह निर्धारित सामूहिक प्रक्रिया के तहत लिया गया हो।
Form 6 और वोटर डेटा का भी मामला
याचिका में मतदाता सूची से जुड़े Form 6 में कथित बदलाव का भी उल्लेख है। इसमें दावा किया गया है कि जुलाई 2026 में फॉर्म में ऐसे विवरण शामिल किए गए, जिनमें आवेदकों से उनके या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पिछले SIR की मतदाता सूची में होने से जुड़ी जानकारी मांगी गई।
इसके अलावा याचिका में Electoral Roll Database और ERONet portal के संचालन तथा पहुंच को लेकर भी कथित आपत्तियों का जिक्र किया गया है।
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ी अपीलों का भी जिक्र
याचिका में पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया से जुड़े करीब 16.10 लाख अपीलों का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि ये अपीलें ऐसे मतदाताओं के संबंध में दायर की गईं, जिनके नाम शामिल करने का निर्देश न्यायिक अधिकारियों ने दिया था।
याचिका में 12 अगस्त 2026 की कथित नोटिंग का हवाला देते हुए कहा गया है कि इस तरह की अपीलें दायर करने की अनुमति किसने दी, इस पर सवाल उठाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अभी आरोपों की जांच बाकी
याचिकाकर्ता ने कहा है कि वह इस स्तर पर सुप्रीम कोर्ट से प्रत्येक विवादित कार्रवाई को अंतिम रूप से अवैध घोषित करने का आग्रह नहीं कर रहा, बल्कि आयोग के मूल रिकॉर्ड मंगाकर यह जांच कराने की मांग कर रहा है कि संबंधित फैसले संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार लिए गए थे या नहीं। अब सुप्रीम कोर्ट अगले सप्ताह इस याचिका पर सुनवाई करेगा। अदालत के समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया, Article 324 और 2023 के कानून में निर्धारित व्यवस्था से जुड़े सवालों पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
