नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने जब उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता (Equity) से जुड़े नए नियम अधिसूचित किए, तो उनका उद्देश्य कैंपस में जातिगत भेदभाव पर रोक लगाना बताया गया। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया- क्या भारत में पहले से ही भेदभाव रोकने के लिए कानून, अदालतों के निर्देश और संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद नहीं हैं?
जवाब है हां, मौजूद हैं। और यही वजह है कि UGC के इन नए नियमों को लेकर छात्र राजनीति से आगे बढ़कर कानूनी और शैक्षणिक जगत में भी असहजता दिख रही है।
संविधान और कानून पहले से क्या कहते हैं?
संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 समानता का अधिकार देते हैं, जाति के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाते हैं और छुआछूत को समाप्त करते हैं। ये प्रावधान विश्वविद्यालयों सहित सभी सार्वजनिक संस्थानों पर लागू होते हैं।
इसके अलावा
SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम
सरकारी सेवा नियम
विश्वविद्यालय अधिनियम और स्टैच्यूट्स
पहले से ही भेदभाव के मामलों में कार्रवाई और कई मामलों में आपराधिक दायित्व तय करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
छात्र आत्महत्याओं और भेदभाव से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट बार-बार विश्वविद्यालयों को निर्देश दे चुका है कि:
प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र बनाए जाएं
मूल्यांकन और अनुशासनात्मक प्रक्रिया में पारदर्शिता हो
शिकायतकर्ता और आरोपी—दोनों के लिए न्यायसंगत प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए
इसी के तहत अधिकतर केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पहले से:
Equal Opportunity Cell
Anti-Ragging Committee
Internal Complaints Committee
ऑनलाइन शिकायत पोर्टल
मौजूद हैं।
कानूनी विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
संवैधानिक और प्रशासनिक कानून की वरिष्ठ वकील आस्था अनुप चतुर्वेदी कहती हैं “भारत में उच्च शिक्षा में भेदभाव से निपटने के लिए पहले से ही मजबूत संवैधानिक और वैधानिक ढांचा मौजूद है। UGC के 2026 के नियम कोई नया अधिकार नहीं देते, बल्कि मौजूदा मानकों को अनिवार्य और एकरूप बनाते हैं।” हालांकि वह यह भी जोड़ती हैं कि विवाद की असली वजह नियमों का प्रवर्तन ढांचा है।
“अनुपालन न करने पर मान्यता और फंडिंग पर असर जैसे प्रावधान, प्रक्रियात्मक संतुलन और निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े करते हैं।”
नए UGC नियमों में क्या बदला है?
नए नियमों के तहत:
सभी विश्वविद्यालयों में अनिवार्य Equity Committees
24×7 शिकायत प्रणाली
समयबद्ध जांच
कड़े अनुपालन नियम, जिनके उल्लंघन पर मान्यता या फंडिंग रद्द तक का प्रावधान
यानी UGC ने अब केवल दिशानिर्देश नहीं, बल्कि कठोर नियामक ढांचा लागू किया है।
आलोचकों की आपत्तियां
आलोचक भेदभाव की समस्या से इनकार नहीं करते, लेकिन कहते हैं:
नए नियम मौजूदा कानूनों की दोहराव करते हैं, बिना यह बताए कि पुराने तंत्र क्यों नाकाम हैं।
ड्यू प्रोसेस—सबूत के मानक, अपील की व्यवस्था, झूठी शिकायतों से सुरक्षा—स्पष्ट नहीं है।
कड़ी सज़ाओं के डर से विश्वविद्यालय अति-सावधानी में निष्पक्ष निर्णय के बजाय रक्षात्मक रवैया अपना सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और नई कमी
सुप्रीम कोर्ट दो बातों पर हमेशा ज़ोर देता रहा है:
जातिगत अपमान पर शून्य सहनशीलता
सभी पक्षों के लिए न्यायसंगत प्रक्रिया
आलोचकों का कहना है कि नए UGC नियम पहली बात पर तो सख्त हैं, लेकिन दूसरी पर स्पष्टता की कमी है। यही अस्पष्टता आगे चलकर कानूनी विवाद, अदालतों की रोक और असमान क्रियान्वयन का कारण बन सकती है।
UGC के नए नियमों का उद्देश्य भले ही संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हो, लेकिन सवाल उनके कार्यान्वयन, प्रक्रिया और संतुलन को लेकर है—यही बहस का केंद्र बना हुआ है।
