नई दिल्ली: देश के सबसे बड़े ग्रामीण ब्रॉडबैंड नेटवर्क प्रोजेक्ट भारतनेट (BharatNet) को डिजिटल इंडिया की रीढ़ माना जाता है, लेकिन ताजा आंकड़ों ने इस महत्वाकांक्षी योजना की जमीनी हकीकत पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 तक भारतनेट के तहत उपलब्ध कराए गए कनेक्शनों में से केवल 45 प्रतिशत के आसपास ही सक्रिय रूप से उपयोग किए जा रहे हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि गांवों तक इंटरनेट पहुंचाने की सरकारी कोशिशों को अभी लंबा रास्ता तय करना है।
लक्ष्य से काफी पीछे भारतनेट
सरकार ने मार्च 2026 तक भारतनेट के तहत 18 लाख फिक्स्ड ब्रॉडबैंड कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा था। हालांकि इस अवधि तक केवल 13.23 लाख कनेक्शन ही स्थापित किए जा सके। इनमें भी सिर्फ 8.01 लाख कनेक्शन सक्रिय पाए गए।
इसका अर्थ है कि लक्ष्य का लगभग 73 प्रतिशत ही हासिल हो पाया और सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या कुल लक्ष्य के मुकाबले आधी से भी कम रही। यह स्थिति तब है जब भारतनेट को दुनिया का सबसे बड़ा ग्रामीण फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क प्रोजेक्ट बताया जाता है।
तीन वर्षों से घट रही नई कनेक्शन वृद्धि
आंकड़े बताते हैं कि भारतनेट के उपयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ने की रफ्तार लगातार धीमी पड़ रही है। वर्ष 2023 में सक्रिय उपभोक्ताओं की संख्या में 4.55 लाख की बढ़ोतरी हुई थी। 2024 में यह बढ़ोतरी घटकर 2.86 लाख रह गई, जबकि 2025 में केवल 2.08 लाख नए सक्रिय उपभोक्ता जुड़े।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रुझान जारी रहा तो ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च गति इंटरनेट उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय समय में हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
गांव तक फाइबर पहुंची, घर तक नहीं
भारतनेट की सबसे बड़ी समस्या ‘लास्ट माइल कनेक्टिविटी’ यानी अंतिम उपभोक्ता तक इंटरनेट पहुंचाने की मानी जा रही है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार कई ग्राम पंचायतों तक ऑप्टिकल फाइबर तो पहुंच गई है, लेकिन वहां से गांवों, घरों और सार्वजनिक स्थानों तक इंटरनेट सेवा नहीं पहुंच पा रही।
यानी फाइबर नेटवर्क पंचायत भवन तक सीमित है, जबकि आम ग्रामीण उपभोक्ता उसके लाभ से वंचित हैं। यही कारण है कि बड़ी संख्या में कनेक्शन निष्क्रिय पड़े हैं।
वाई-फाई हॉटस्पॉट भी नहीं दे पाए अपेक्षित परिणाम
भारतनेट के तहत सार्वजनिक वाई-फाई हॉटस्पॉट ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट पहुंचाने का एक प्रमुख माध्यम माना गया था। लेकिन सितंबर 2025 तक लगाए गए 1.04 लाख वाई-फाई हॉटस्पॉट में से केवल 766 ही चालू पाए गए थे।
यह कुल स्थापित हॉटस्पॉट का एक प्रतिशत भी नहीं है। संसदीय समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा था कि बुनियादी ढांचा तैयार होने के बावजूद उसका उपयोग बेहद कम है।
फंड खर्च करने में भी पिछड़ रही योजना
संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में भारतनेट के लिए संशोधित बजट 6,500 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया था। लेकिन वित्तीय वर्ष के दौरान केवल 3,145 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके।
यानी कुल आवंटित राशि का करीब 48 प्रतिशत ही उपयोग हुआ। समिति ने इसे परियोजना की धीमी प्रगति का एक बड़ा कारण बताया था।
सरकार ने स्वीकार की चुनौतियां
केंद्रीय संचार राज्य मंत्री डॉ. चंद्रशेखर पेम्मासानी ने हाल ही में स्वीकार किया था कि भारतनेट के पहले और दूसरे चरण में कई कमियां रहीं। उन्होंने कहा कि अब उन समस्याओं को दूर करते हुए जवाबदेही के साथ काम किया जा रहा है।
सरकार का नया लक्ष्य पहले चरण में 1.5 करोड़ ग्रामीण परिवारों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाना है।
डिजिटल इंडिया के सपने की अहम कड़ी
भारतनेट केवल इंटरनेट परियोजना नहीं है बल्कि ग्रामीण भारत में ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं, कृषि परामर्श और डिजिटल कारोबार को बढ़ावा देने का आधार भी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लास्ट माइल कनेक्टिविटी की समस्या का समाधान नहीं किया गया तो करोड़ों रुपये के निवेश के बावजूद परियोजना का पूरा लाभ ग्रामीण आबादी तक नहीं पहुंच पाएगा।
आगे की राह
सरकार ने 2023 में 1.39 लाख करोड़ रुपये की संशोधित भारतनेट योजना को मंजूरी दी थी। इसके तहत अगले पांच वर्षों में ग्रामीण घरों, संस्थानों और उद्यमों को 1.5 करोड़ फिक्स्ड ब्रॉडबैंड कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा गया है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल फाइबर बिछाना पर्याप्त नहीं होगा। गांवों में अंतिम उपभोक्ता तक सस्ती और भरोसेमंद इंटरनेट सेवा पहुंचाना ही भारतनेट की असली सफलता तय करेगा।
