नई दिल्ली. राजस्थान हाईकोर्ट (Rajasthan High Court) ने पंचायत परिसीमन और पुनर्गठन को चुनौती देने वाली 60 याचिकाओं को बुधवार को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Panchayat Delimitation एक प्रशासनिक (administrative) और नीति-आधारित प्रक्रिया है, जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप से केवल लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में अनावश्यक देरी होगी। इस फैसले के साथ ही राज्य में Panchayat Elections 2026 को समय पर कराने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
न्यायमूर्ति इंदरजीत सिंह और रवि चिरानिया की खंडपीठ ने कहा कि परिसीमन नीति से जुड़ा प्रशासनिक अभ्यास है और इसमें कोर्ट का दखल चुनावी प्रक्रिया को बाधित कर सकता है, जिसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि राजस्थान में पंचायत चुनाव 15 अप्रैल तक पूरे होने चाहिए, और इस स्तर पर हस्तक्षेप अस्वीकार्य है।
सुप्रीम कोर्ट की मुहर पहले ही लग चुकी
गौरतलब है कि 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने भी राजस्थान के Panchayat Delimitation and Reorganisation को अंतिम मंजूरी देते हुए सिंघानिया राजस्व गांव के ग्रामीणों द्वारा दायर SLP को खारिज कर दिया था। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के 14 नवंबर 2025 के फैसले को बरकरार रखते हुए परिसीमन प्रक्रिया में हस्तक्षेप से इनकार किया और चुनाव तय समयसीमा में कराने का मार्ग प्रशस्त किया।
पहले के आदेश और समयसीमा
हाईकोर्ट ने इससे पहले राज्यव्यापी परिसीमन को वैध ठहराते हुए इसे 31 दिसंबर 2025 तक पूरा करने और सभी पंचायती राज संस्थानों (Panchayati Raj Institutions) के चुनाव 15 अप्रैल से पहले कराने के निर्देश दिए थे।
क्या होगा असर
राज्य में Local Body Elections समय पर कराए जा सकेंगे।
चुनावी कार्यक्रम में अब कानूनी अड़चनें नहीं रहेंगी।
ग्रामीण स्तर पर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया तेज होगी।
