नई दिल्ली: देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की रफ्तार धीमी पड़ने और एल नीनो के प्रभाव के कारण बारिश में भारी कमी दर्ज की जा रही है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, मानसून फिलहाल महाराष्ट्र के ऊपर ठहर गया है और देश में अब तक सामान्य से करीब 41 प्रतिशत कम वर्षा हुई है। मौसम विभाग ने अनुमान लगाया है कि इस वर्ष मानसून के दौरान देश में दीर्घकालिक औसत वर्षा का लगभग 90 प्रतिशत ही बारिश हो सकती है, जिसे विशेषज्ञ एल नीनो के प्रभाव से जोड़ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बारिश की स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ तो इसका असर केवल कृषि तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य महंगाई, जल संकट और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
क्या है एल नीनो और क्यों बढ़ी चिंता?
एल नीनो, एल नीनो सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) नामक जलवायु प्रणाली का एक चरण है। इसके दौरान प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है, जिससे दुनिया भर के मौसम पैटर्न प्रभावित होते हैं।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बार एल नीनो का प्रभाव काफी मजबूत रहने की संभावना है। आमतौर पर यह मार्च-अप्रैल में विकसित होता है और साल के अंत तक अपनी चरम स्थिति में पहुंचता है। लेकिन इस बार इसका असर मानसून सीजन के दौरान ही स्पष्ट दिखाई देने लगा है।
सूखे जैसी स्थिति का खतरा
कृषि अर्थशास्त्री Ashok Gulati का कहना है कि यदि मानसून सामान्य से 89 प्रतिशत तक सीमित रह जाता है तो देश सूखे जैसी स्थिति के बेहद करीब पहुंच सकता है।
हालांकि केंद्र सरकार का दावा है कि देश के पास गेहूं और चावल का पर्याप्त भंडार मौजूद है। जून 2026 तक सरकारी गोदामों में लगभग 53.41 मिलियन मीट्रिक टन खाद्यान्न का भंडार है, जो निर्धारित न्यूनतम स्तर से लगभग दोगुना है। ऐसे में खाद्यान्न संकट या अकाल की संभावना कम मानी जा रही है।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि आर्थिक असर नहीं होगा। यदि कृषि क्षेत्र की विकास दर में गिरावट आती है तो किसानों की आय प्रभावित होगी और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।
महंगाई बढ़ने की आशंका
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान में खाद्य महंगाई लगभग 4.8 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन कमजोर मानसून की स्थिति बनी रही तो अक्टूबर-नवंबर तक यह 5 से 6 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
त्योहारी सीजन के दौरान मांग बढ़ने के कारण दालों, तिलहन, सब्जियों, फलों और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इससे आम उपभोक्ताओं की जेब पर भी असर पड़ेगा।
किसानों के सामने बड़ी चुनौती
केंद्र सरकार ने राज्यों को सलाह दी है कि किसान अधिक पानी वाली फसलों के बजाय कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की ओर रुख करें। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव इतनी जल्दी संभव नहीं है।
किसान संगठनों का कहना है कि जिन किसानों ने वर्षों से धान जैसी फसलें उगाई हैं, उनके लिए अचानक खेती का तरीका बदलना आसान नहीं होगा। कई किसानों ने मानसून की उम्मीद में पहले ही खेत तैयार कर लिए हैं, इसलिए वैकल्पिक फसलों की ओर जाना उनके लिए चुनौतीपूर्ण है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि किसान अरहर, मूंग, रागी, मोटे अनाज और मिश्रित खेती जैसी कम पानी वाली फसलों को अपनाने पर विचार करें।
शहरों में भी बढ़ सकता है जल संकट
कमजोर मानसून का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है। जल विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि देश के कई शहर पहले से ही पानी की कमी का सामना कर रहे हैं।
पूर्व वैज्ञानिकों और जल विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण की व्यवस्था अभी भी पर्याप्त नहीं है। मुंबई, पुणे और कई अन्य शहरों में जल आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा है। यदि मानसून कमजोर रहा तो आने वाले महीनों में जल संकट और गंभीर हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और पुनर्चक्रण जैसी व्यवस्थाओं को प्राथमिकता देना अब समय की आवश्यकता बन गई है।
किन राज्यों पर सबसे अधिक असर?
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तर कर्नाटक ऐसे राज्य हैं जहां एल नीनो का प्रभाव सबसे अधिक देखने को मिल सकता है। वहीं पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना जताई गई है।
हालांकि मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून केवल एल नीनो से प्रभावित नहीं होता। हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) जैसे अन्य जलवायु कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि मानसून के उत्तरार्ध में सकारात्मक IOD विकसित होता है तो वर्षा की स्थिति में कुछ सुधार संभव है।
जल और कृषि प्रबंधन की बड़ी परीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 का मानसून भारत के लिए केवल मौसम संबंधी चुनौती नहीं बल्कि जल प्रबंधन, कृषि नीति और खाद्य सुरक्षा की भी बड़ी परीक्षा है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर किसानों की आय, खाद्य कीमतों और देश की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।
एल नीनो के बढ़ते प्रभाव के बीच सरकार, राज्यों और आम नागरिकों के लिए जल संरक्षण और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन को प्राथमिकता देना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
