नई दिल्ली. साल 2026 में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार से अब तक 22 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम निकाल ली है। यह पिछले साल 2025 के रिकॉर्ड 18.9 अरब डॉलर के आउटफ्लो से भी ज्यादा है। बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों, कमजोर रुपये, धीमी कॉर्पोरेट कमाई और AI आधारित वैश्विक निवेश रुझानों के कारण विदेशी निवेशकों का भरोसा भारतीय बाजार से कमजोर हुआ है।
ईरान संघर्ष के बाद बढ़ी बिकवाली
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के अनुसार, करीब 19 अरब डॉलर की बिकवाली ईरान संघर्ष बढ़ने के बाद हुई। इस तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गईं, जिससे महंगाई, वित्तीय दबाव और भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता बढ़ गई। भारत अपनी लगभग 90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है और इसका बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है। ऐसे में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधे पड़ता है।
बैंकिंग और IT सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर
विदेशी निवेशकों की बिकवाली का सबसे ज्यादा असर बैंकिंग और वित्तीय शेयरों पर पड़ा है। इस सेक्टर से करीब 79,981 करोड़ रुपये निकाले गए हैं। वहीं IT सेक्टर में भी लगभग 22 हजार करोड़ रुपये की बिकवाली दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर कमाई और शेयर बाजार के ऊंचे वैल्यूएशन ने विदेशी निवेशकों की चिंता बढ़ाई है। FY26 में निफ्टी कंपनियों की कमाई वृद्धि केवल 7.3 प्रतिशत रही, जबकि भारतीय बाजार लगभग 22 गुना प्राइस-टू-अर्निंग अनुपात पर कारोबार कर रहा था।
AI और Semiconductor Markets की ओर बढ़ रहा वैश्विक निवेश
विशेषज्ञों के मुताबिक इस समय दुनिया भर के निवेशक Artificial Intelligence, Semiconductor और Data Centre से जुड़े बाजारों की ओर तेजी से पैसा लगा रहे हैं। ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को इसका बड़ा फायदा मिला है, जबकि भारत इन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कमजोर माना जा रहा है।
Gurvinder Juneja ने कहा कि वैश्विक निवेशकों का फोकस फिलहाल AI और सेमीकंडक्टर थीम पर है और भारत की मौजूदगी इन सेक्टर्स में सीमित है। इसी कारण विदेशी पूंजी तेजी से अन्य एशियाई बाजारों की ओर जा रही है।
घरेलू निवेशकों ने बाजार को संभाला
हालांकि विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने भारतीय बाजार को बड़ी राहत दी है। म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियों, बैंकों और रिटायरमेंट फंड्स ने 2026 के शुरुआती चार महीनों में भारतीय शेयरों में 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश किया है। घरेलू निवेशकों की मजबूत भागीदारी, SIP निवेश में लगातार बढ़ोतरी और शेयर बाजार में बढ़ती रिटेल हिस्सेदारी ने बाजार को स्थिर बनाए रखने में मदद की है। Prashata Seth ने कहा कि घरेलू निवेशक अब भारतीय बाजार के लिए स्थिरता का बड़ा आधार बन चुके हैं, लेकिन लंबे समय तक विदेशी बिकवाली जारी रहने पर केवल घरेलू निवेश बाजार को पूरी तरह संभाल नहीं सकता।
MSCI Emerging Markets Index में भारत की हिस्सेदारी घटी
वैश्विक निवेशकों के रुझान बदलने का असर MSCI Emerging Markets Index में भारत की हिस्सेदारी पर भी पड़ा है। सितंबर 2024 में जहां भारत का वजन करीब 21 प्रतिशत था, वहीं मई 2026 तक यह घटकर लगभग 12 प्रतिशत रह गया है।
इस गिरावट का सबसे ज्यादा असर बैंकिंग, IT और FMCG सेक्टर में देखने को मिला है। कई विदेशी फंड अब भारतीय IT शेयरों में बिकवाली कर एशिया के टेक्नोलॉजी आधारित बाजारों में निवेश बढ़ा रहे हैं।
लंबी अवधि में भारत की Growth Story बरकरार
Shahzad Madon का मानना है कि फिलहाल AI निवेश का वैश्विक ट्रेंड कुछ चुनिंदा देशों को फायदा पहुंचा रहा है, लेकिन भारत की लंबी अवधि की आर्थिक कहानी अभी भी मजबूत बनी हुई है। उन्होंने कहा कि मैन्युफैक्चरिंग, डिफेंस, एनर्जी ट्रांजिशन और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में निवेश भविष्य में भारत को मजबूत बढ़त दिला सकता है। अगर कॉर्पोरेट कमाई में सुधार आता है और बाजार वैल्यूएशन आकर्षक होते हैं तो विदेशी निवेशकों की वापसी भी संभव है।
भारतीय बाजार के सामने फिलहाल चुनौतीपूर्ण माहौल
विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल वैश्विक निवेशकों की प्राथमिकता AI आधारित विकास वाले बाजार बन गए हैं। ऐसे में भारतीय शेयर बाजार को दोबारा विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए मजबूत आर्थिक वृद्धि, स्थिर रुपया और बेहतर कॉर्पोरेट प्रदर्शन दिखाना होगा।
