नई दिल्ली. मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अहम स्पष्टीकरण दिया। Chief Justice of India (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि अदालत ने निर्वाचन आयोग (ECI) के नए Form 6 की वैधता पर कभी फैसला नहीं दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिहार में Special Intensive Revision (SIR) से जुड़े मामले की सुनवाई के समय संशोधित फॉर्म मौजूद ही नहीं था। अब इस विवाद को 27 अक्टूबर को SIR से संबंधित अन्य याचिकाओं के साथ सुना जाएगा।
‘सुप्रीम कोर्ट ने न मंजूरी दी, न खारिज किया’
सोमवार को CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के सामने Form 6 में कथित बदलावों को चुनौती देने वाली नई याचिका का उल्लेख किया गया। इस दौरान अदालत ने साफ कहा कि उसकी पिछली टिप्पणियों को संशोधित फॉर्म की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं माना जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि अदालत की टिप्पणियां अपने आप में संवैधानिक मुद्दे पर न्यायिक निर्णय नहीं होतीं। नए Form 6 पर कोई फैसला नहीं दिया गया है। सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी कहा, ‘हमारे मुंह में शब्द न डालें।’
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि 5 अक्टूबर को CJI की टिप्पणी का आशय केवल इतना था कि बिहार SIR पर फैसला दिए जाने के समय संशोधित फॉर्म अस्तित्व में नहीं था। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सुप्रीम कोर्ट ने नए फॉर्म को मंजूरी दी थी या उसे खारिज किया था।
अदालत ने कहा कि अब जब यह मुद्दा उसके सामने लाया गया है, तो इसकी जांच की जाएगी। मामले को 27 अक्टूबर को SIR से जुड़ी अन्य याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है। उस दिन निर्वाचन आयोग के कामकाज और मतदाता सूची संशोधन से जुड़े फैसलों की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली व्यापक याचिकाओं पर भी सुनवाई होनी है।
Form 6 में किस बदलाव को लेकर विवाद?
Form 6 का इस्तेमाल उन नागरिकों द्वारा किया जाता है, जो मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करते हैं। विवाद ऑनलाइन Form 6 के साथ जोड़ी गई एक अतिरिक्त घोषणा को लेकर है।
इस घोषणा के तहत आवेदक को बताना होता है कि क्या उसका अपना नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR प्रक्रिया के दौरान तैयार की गई मतदाता सूची में दर्ज था। ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया में इस शर्त को शामिल किए जाने के बाद इसकी कानूनी वैधता पर सवाल उठने लगे।
इस बदलाव को लेकर चिंता जताई गई कि पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं के लिए यह शर्त कैसे लागू होगी, क्योंकि उनका नाम पिछली मतदाता सूची में दर्ज होना जरूरी नहीं है। वहीं, जिन लोगों का नाम पहले मतदाता सूची से हट चुका है और जो दोबारा पंजीकरण कराना चाहते हैं, उन्हें परिवार से जुड़े रिकॉर्ड के आधार पर जानकारी देने में परेशानी हो सकती है।
5 अक्टूबर को भी कोर्ट ने मांगा था रिकॉर्ड
इससे पहले 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उसने Form 6 में किसी भी संशोधन को मंजूरी नहीं दी है। अदालत ने यह पता लगाने के लिए संबंधित रिकॉर्ड मांगे थे कि फॉर्म में बदलाव किसने अधिकृत किए और उनके तहत कौन-सी नई शर्तें जोड़ी गईं।
अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल याचिका में कथित बदलावों को चुनौती दी गई है। उनकी तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अदालत को बताया था कि Form 6 में दो नई शर्तें शामिल की गई हैं। इस पर पीठ ने स्पष्ट किया था कि उसने इन बदलावों को मंजूरी नहीं दी है और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले मूल दस्तावेजों की जांच करना चाहती है।
निर्वाचन आयोग का क्या कहना है?
निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को जारी एक प्रेस नोट में कहा था कि अतिरिक्त घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था। आयोग के अनुसार, Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित वैधानिक Form 6 का इस्तेमाल SIR अवधि के बाहर भी जारी रहेगा।
ECI का पक्ष है कि मूल वैधानिक Form 6 में बदलाव नहीं किया गया, बल्कि SIR प्रक्रिया के लिए उसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। आयोग ने यह भी कहा कि जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां ऑनलाइन फॉर्म से यह अतिरिक्त घोषणा हटा दी गई है और आवेदक फिर से निर्धारित वैधानिक Form 6 का इस्तेमाल कर रहे हैं।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं की आपत्ति इस बात पर है कि क्या मूल नियमों में संशोधन किए बिना केवल ऑनलाइन फॉर्म में अतिरिक्त शर्त जोड़ी जा सकती है। यही सवाल इस कानूनी विवाद का प्रमुख हिस्सा है।
कानून में संशोधन की प्रक्रिया पर भी सवाल
Representation of the People Act, 1950 की धारा 28 के तहत केंद्र सरकार निर्वाचन आयोग से परामर्श करके Registration of Electors Rules बनाती है। नियमों में संशोधन के लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया अपनाना जरूरी होता है। नियमों में बदलाव अधिसूचित किए जाने और संसद के समक्ष रखे जाने की प्रक्रिया भी प्रासंगिक है।
इसी आधार पर याचिकाओं में सवाल उठाया गया है कि क्या ऑनलाइन Form 6 के साथ अतिरिक्त घोषणा जोड़ना वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप था। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग का कहना है कि मूल फॉर्म में बदलाव नहीं हुआ, बल्कि SIR के दौरान इस्तेमाल के लिए अलग से घोषणा जोड़ी गई थी।
अब सुप्रीम कोर्ट 27 अक्टूबर को इस मुद्दे पर सुनवाई करेगा। अदालत के सामने यह स्पष्ट करने का सवाल होगा कि अतिरिक्त घोषणा किस कानूनी आधार पर जोड़ी गई और क्या इसके लिए निर्धारित नियमों के तहत औपचारिक संशोधन आवश्यक था।
