नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि कोई भी न्यायिक अधिकारी (judicial officer), जिसके पास न्यायिक सेवा और वकालत दोनों में मिलाकर कम से कम सात साल का अनुभव हो, वह डायरेक्ट रिक्रूटमेंट (direct recruitment) के ज़रिए जिला जज (District Judge) पद के लिए आवेदन करने के योग्य है। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही वर्ष 2020 के निर्णय को पलट दिया।
1984 और 2020 के फैसले गलत कानून व्याख्या पर आधारित : सुप्रीम कोर्ट
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की जगह CJI बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Constitution Bench) ने कहा कि शीर्ष अदालत का 1984 का Satya Narain Singh vs Allahabad High Court और 2020 का Dheeraj Mor vs High Court of Delhi का फैसला सही कानूनी व्याख्या नहीं था। मुख्य न्यायाधीश गवई ने अपने और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, एस.सी. शर्मा और के. विनोद चंद्रन की ओर से लिखे निर्णय में कहा कि सत्य नारायण सिंह केस में किया गया यह अवलोकन कि यदि कोई पहले से सेवा में व्यक्ति जिला जज के रूप में नियुक्त होता है तो यह अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के अधिकारों का उल्लंघन है संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सही अर्थ नहीं है। न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरश ने इस पर समान विचार व्यक्त करते हुए अलग लेकिन सहमति वाला फैसला दिया।
‘मेरिट ही होगी चयन का आधार’ : सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि यदि न्यायिक अधिकारियों को भी एडवोकेट्स (advocates) के साथ प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति दी जाए, तो इससे ज्यादा योग्य और प्रतिभाशाली उम्मीदवारों को अवसर मिलेगा।
“जब नियुक्तियाँ केवल मेरिट के आधार पर होंगी, तो योग्य न्यायिक अधिकारियों के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चयन में केवल merit and merit alone shall matter।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी योग्य व्यक्ति को केवल इसलिए वंचित करना कि वह न्यायिक सेवा में है, अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
2020 के ‘Dheeraj Mor’ केस की व्याख्या गलत थी
संविधान पीठ ने कहा कि 2020 के Dheeraj Mor मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 233(2) (जो जिला जज की नियुक्तियों से संबंधित है) की गलत व्याख्या की थी।
“यदि सत्य नारायण सिंह से लेकर धीरेज मोर केस तक की व्याख्या को स्वीकार कर लिया जाए, तो यह अनुच्छेद 233(2) के पहले भाग को ही निष्प्रभावी बना देगा।”
‘न्यायिक अधिकारी वकीलों से अधिक अनुभव रखते हैं’ — SC
कोर्ट ने कहा कि जिला जजों की दक्षता बढ़ाने के लिए युवा और प्रतिभाशाली न्यायिक अधिकारियों को मौका देना जरूरी है। न्यायिक अधिकारियों को काम के दौरान जो अनुभव मिलता है, वह किसी वकील की तुलना में कहीं अधिक होता है। इसके अलावा, न्यायिक अधिकारी बनने से पहले उन्हें कम से कम एक वर्ष की कठोर ट्रेनिंग से भी गुजरना पड़ता है।
उम्र और पात्रता पर भी दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिला जज या अतिरिक्त जिला जज (Additional District Judge) के लिए पात्रता का मूल्यांकन आवेदन की तारीख के अनुसार किया जाएगा। समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए, एडवोकेट्स और न्यायिक अधिकारियों दोनों के लिए न्यूनतम आयु सीमा 35 वर्ष होगी।
राज्य सरकारों को तीन महीने में नियम संशोधन का निर्देश
कोर्ट ने कहा कि जिन राज्यों के नियम इस नए निर्णय के अनुरूप नहीं हैं, उन्हें रद्द माना जाएगा। सभी राज्य सरकारें, संबंधित उच्च न्यायालयों से परामर्श कर, तीन महीने के भीतर नए नियम तैयार करें या पुराने नियमों में संशोधन करें।
