नई दिल्ली. स्वतंत्रता दिवस 2026 के मौके पर दिल्ली के लाल किले पर इस बार का समारोह ऐतिहासिक बन गया। पहली बार Independence Day समारोह में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण संस्करण प्रस्तुत किया गया। यह आयोजन इस गीत की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष कार्यक्रम का हिस्सा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में हुए समारोह में सेना के बैंड ने ‘वंदे मातरम्’ की धुन बजाई और कार्यक्रम में मौजूद अतिथियों ने भी राष्ट्रीय गीत के साथ स्वर मिलाया। इसके बाद राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया और राष्ट्रगान प्रस्तुत किया गया।
तिरंगे के साथ दिखी ‘वंदे मातरम्’ की झलक
लाल किले पर आयोजित Independence Day Ceremony में देशभक्ति का विशेष माहौल देखने को मिला। तिरंगा फहराए जाने के बाद उसे ‘राष्ट्रीय सलामी’ दी गई। भारतीय वायुसेना के दो Mi-17 हेलीकॉप्टरों ने भी विशेष हवाई प्रदर्शन किया। इनमें से एक हेलीकॉप्टर पर राष्ट्रीय ध्वज और दूसरे पर ‘वंदे मातरम्’ लिखा हुआ ध्वज प्रदर्शित किया गया। समारोह के दौरान लाल किले के ऊपर फूलों की पंखुड़ियां भी बरसाई गईं। ऐतिहासिक परिसर को भी विशेष रूप से सजाया गया था। प्राचीर पर फूलों से बनाए गए डिजाइन के बीच तिरंगे को केंद्र में रखा गया और दोनों ओर हिंदी में ‘वंदे मातरम्’ लिखा गया।
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा है ‘वंदे मातरम्’ का इतिहास
‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी। इसे पहली बार 7 नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित किया गया था। बाद में 1882 में प्रकाशित उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में भी इसे शामिल किया गया। धीरे-धीरे यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रवादी भावना का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। वर्ष 1905 में Swadeshi Movement के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का इस्तेमाल ब्रिटिश शासन के विरोध और देशभक्ति की अभिव्यक्ति के लिए बड़े स्तर पर किया गया।
कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया
‘वंदे मातरम्’ को पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वर्ष 1896 में सार्वजनिक रूप से गाया गया था। उस समय रवींद्रनाथ टैगोर ने इसका गायन किया और बाद में इसकी धुन भी तैयार की। इसके बाद यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन से लगातार जुड़ता चला गया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे लोगों में राष्ट्रीय भावना जगाने का माध्यम बना।
1950 में मिला राष्ट्रीय गीत का दर्जा
स्वतंत्र भारत में संविधान सभा ने वर्ष 1950 में ‘वंदे मातरम्’ को National Song यानी राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद से यह देश के राष्ट्रीय और सांस्कृतिक जीवन में एक विशेष स्थान रखता है। केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष नवंबर में ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर सालभर चलने वाले कार्यक्रमों की शुरुआत की थी। इसी क्रम में इस वर्ष लाल किले पर इसका पूर्ण संस्करण प्रस्तुत किया गया।
पूरे गीत को लेकर क्यों हुआ था विवाद?
‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण को लेकर इतिहास में विवाद भी रहा है। 1930 के दशक में मुस्लिम लीग ने गीत के कुछ हिस्सों में मौजूद धार्मिक प्रतीकों और मातृभूमि को देवी के रूप में प्रस्तुत किए जाने पर आपत्ति जताई थी। कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई। अक्टूबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में मुख्य रूप से गीत के शुरुआती दो अंतरों के इस्तेमाल का फैसला किया, ताकि धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवादों से बचा जा सके।
जवाहरलाल नेहरू ने भी माना था कि ‘वंदे मातरम्’ लंबे समय से भारतीय राष्ट्रवाद से जुड़ा हुआ है, लेकिन राष्ट्रीय कार्यक्रमों में उन हिस्सों से बचने की जरूरत है जिनमें धार्मिक या प्रतीकात्मक संदर्भों को लेकर आपत्ति हो सकती है। यही वजह रही कि लंबे समय तक सार्वजनिक राष्ट्रीय समारोहों में ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो अंतरे ही प्रमुख रूप से प्रस्तुत किए जाते रहे।
महात्मा गांधी भी गीत के प्रभाव से थे प्रभावित
महात्मा गांधी ने भी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के प्रभाव और देशभक्ति जगाने वाली इसकी भावना की सराहना की थी। 1905 में स्वदेशी आंदोलन के दौरान उन्होंने बड़े समूहों के एक साथ इस गीत को गाने का उल्लेख किया था। गांधी का मानना था कि इसका प्रमुख उद्देश्य लोगों के भीतर देशभक्ति की भावना को जागृत करना था। हालांकि, बाद के वर्षों में जब साम्प्रदायिक तनाव बढ़ा, तब उन्होंने यह भी कहा कि जिन सभाओं में लोग इस गीत के कुछ हिस्सों को लेकर गंभीर आपत्ति रखते हों, वहां इसे लेकर टकराव से बचना चाहिए।
150 साल बाद लाल किले पर बना नया इतिहास
‘वंदे मातरम्’ का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रवाद और उससे जुड़े सामाजिक-राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। 19वीं सदी की एक बंगाली साहित्यिक रचना से शुरू हुआ यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना और बाद में भारत का राष्ट्रीय गीत कहलाया। अब इसकी रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर लाल किले पर Independence Day समारोह में पहली बार इसका पूर्ण संस्करण प्रस्तुत किया गया। राष्ट्रगान से पहले हुए इस गायन ने ‘वंदे मातरम्’ के लंबे इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया।

