नई दिल्ली. राजस्थान में कभी खेतों की मेड़, बाड़ और झाड़ियों में अपने आप उगने वाली कीकोड़ा सब्जी अब किसानों के लिए profitable crop बनती जा रही है। बरसात के सीमित मौसम में मिलने वाली इस पारंपरिक सब्जी की बाजार में मांग बढ़ने के साथ कीमत भी तेजी से बढ़ी है। राजस्थान के कई इलाकों में कीकोड़ा 120 से 300 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। यही वजह है कि किसान इसे अब सिर्फ घरेलू इस्तेमाल की सब्जी नहीं, बल्कि additional income source के तौर पर भी देखने लगे हैं।
खेतों की बाड़ से मंडियों और शहरों तक पहुंचा कीकोड़ा
पहले ग्रामीण इलाकों में लोग कीकोड़ा को खेतों की बाड़ या आसपास की झाड़ियों से तोड़कर घर ले आते थे। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से घरेलू भोजन के लिए किया जाता था। लेकिन अब इसकी बढ़ती market demand ने इसे व्यावसायिक रूप देना शुरू कर दिया है। कई किसान इसकी पैदावार पर ध्यान दे रहे हैं और स्थानीय बाजारों के अलावा जयपुर, उदयपुर, जोधपुर और अहमदाबाद जैसे शहरों तक इसकी सप्लाई की जा रही है।
सिर्फ 2 से 3 महीने मिलता है कीकोड़ा, इसलिए रहता है महंगा
कीकोड़ा की उपलब्धता मुख्य रूप से July to September यानी बारिश के मौसम तक सीमित रहती है। कम समय के लिए बाजार में उपलब्ध होने और मांग अधिक रहने के कारण इसकी कीमत सामान्य हरी सब्जियों से काफी ज्यादा हो जाती है।
बारिश के दौरान इसकी मांग बढ़ती है, लेकिन उत्पादन और आपूर्ति सीमित रहने के कारण किसानों को अच्छे दाम मिल जाते हैं। यही limited supply and high demand इसे किसानों के लिए आकर्षक फसल बनाती है।
पोषक तत्वों से भरपूर है कीकोड़ा
कीकोड़ा को सिर्फ कमाई के लिहाज से ही महत्वपूर्ण नहीं माना जा रहा, बल्कि इसमें कई nutrients भी पाए जाते हैं। इसमें Vitamin C, Fiber, Iron, Calcium और Antioxidants मौजूद होते हैं। पारंपरिक और आयुर्वेदिक मान्यताओं में भी इसे पाचन तंत्र और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए उपयोगी माना जाता है।
स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच healthy food की मांग बढ़ रही है। इसका फायदा भी कीकोड़ा जैसी पारंपरिक सब्जियों को मिल रहा है।
कम लागत में अच्छी कमाई का मौका
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार कीकोड़ा की खेती में कई दूसरी सब्जियों के मुकाबले लागत कम हो सकती है। यह एक बेल वाली फसल है और बरसात के मौसम में तेजी से बढ़ती है। इसके उत्पादन में रासायनिक दवाओं की जरूरत भी अपेक्षाकृत कम बताई जाती है।
अगर किसानों को quality seeds, modern farming techniques और बेहतर marketing facilities उपलब्ध कराई जाएं तो कीकोड़ा राजस्थान में एक महत्वपूर्ण cash crop के रूप में उभर सकता है।
किसानों को मिल रहा बाजार का फायदा
उदयपुर जिले के बिछड़ी क्षेत्र के किसान चुनीलाल डांगी के मुताबिक पहले कीकोड़ा खेतों की बाड़ में प्राकृतिक रूप से उगता था और परिवार इसका इस्तेमाल घर में ही करता था। अब व्यापारी गांव तक पहुंचकर इसे खरीद रहे हैं। इससे किसानों को खेती से अलग extra income हासिल हो रही है।
वहीं गोटीपा निवासी किसान श्रवण सिंह देवल बताते हैं कि बरसात में कीकोड़ा की मांग काफी बढ़ जाती है। मंडी तक पहुंचते ही इसे खरीदार मिल जाते हैं। कम मेहनत में बेहतर कीमत मिलने के कारण किसान अब इसकी पैदावार और देखभाल पर पहले से ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
क्यों ‘हरा सोना’ बन रहा कीकोड़ा?
कीकोड़ा के बढ़ते कारोबार के पीछे कई वजहें हैं। यह पहले खेतों और झाड़ियों तक सीमित था, लेकिन अब local markets से लेकर hotels और बड़े शहरों तक पहुंच रहा है। बरसात के सीमित मौसम में उपलब्धता, पोषण संबंधी खूबियां और बढ़ती consumer demand इसकी कीमत को बढ़ा रही हैं।
इसके अलावा low investment, high return और व्यावसायिक खेती की संभावनाएं भी इसे किसानों के लिए आकर्षक बना रही हैं। यही कारण है कि कीकोड़ा को ग्रामीण क्षेत्रों में अब ‘हरा सोना’ कहा जाने लगा है।
वैज्ञानिक खेती और बेहतर मार्केटिंग से बढ़ सकती है आमदनी
सहायक कृषि अधिकारी डबोक भावना डांगी के अनुसार कीकोड़ा पौष्टिक होने के साथ-साथ औषधीय महत्व वाली सब्जी है और इसकी commercial farming की अच्छी संभावनाएं हैं। किसानों को यदि वैज्ञानिक खेती की जानकारी, बेहतर तकनीक और उचित marketing support मिले तो यह फसल उनकी आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
राजस्थान में कीकोड़ा की बढ़ती मांग यह संकेत देती है कि पारंपरिक और स्थानीय फसलों को आधुनिक बाजार से जोड़कर किसानों के लिए new income opportunities तैयार की जा सकती हैं।
