नई दिल्ली: वैश्विक स्तर पर खाद्य कीमतें फिलहाल अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई हैं, लेकिन आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं-प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा अल नीनो और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, जिसने उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित किया है।
अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने 11 जून को घोषणा की कि अल नीनो की स्थिति विकसित हो चुकी है। एजेंसी के अनुसार अक्टूबर से जनवरी के बीच इसके “बहुत मजबूत” रूप लेने की संभावना 62 से 63 प्रतिशत तक है। अल नीनो आमतौर पर भारत सहित एशिया के कई हिस्सों में कम वर्षा और अधिक तापमान से जुड़ा होता है, जिसका सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है।
फिलहाल खाद्य कीमतें क्यों हैं नियंत्रण में?
वर्तमान समय में वैश्विक खाद्य बाजार पर इसका प्रभाव सीमित दिखाई दे रहा है। गेहूं, मक्का, चावल, चीनी और डेयरी उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें पिछले वर्ष की तुलना में अपेक्षाकृत नियंत्रित हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) का खाद्य मूल्य सूचकांक भी मई 2026 में केवल 2.9 प्रतिशत की वार्षिक बढ़ोतरी दर्ज कर पाया है। यह मार्च 2022 के रिकॉर्ड स्तर से काफी नीचे है, जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक खाद्य कीमतों में तेज उछाल आया था।
रिकॉर्ड उत्पादन ने दी राहत
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार दो वर्षों की रिकॉर्ड कृषि पैदावार ने वैश्विक खाद्य बाजार को मजबूत आधार दिया है। अमेरिका के कृषि विभाग के अनुसार 2025-26 में दुनिया में गेहूं, चावल, मक्का, सोयाबीन और चीनी का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है। यही कारण है कि अभी तक अल नीनो और पश्चिम एशिया संकट का खाद्य कीमतों पर व्यापक असर नहीं दिखा है।
खाद्य तेलों की कीमतों में बढ़ोतरी
हालांकि खाद्य तेलों की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक हैं। इसका एक प्रमुख कारण इन तेलों का जैव ईंधन (बायोफ्यूल) के रूप में बढ़ता उपयोग है। जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो खाद्य तेलों की मांग भी बढ़ जाती है, जिससे उनके दाम ऊपर चले जाते हैं।
भारत में दिखने लगे महंगाई के संकेत
भारत में भी खाद्य महंगाई के शुरुआती संकेत दिखाई देने लगे हैं। उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक आधारित खाद्य महंगाई मई 2026 में बढ़कर 4.8 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो अप्रैल में 4.2 प्रतिशत थी। इससे पहले कई महीनों तक खाद्य महंगाई अपेक्षाकृत कम या नकारात्मक स्तर पर बनी हुई थी।
रबी फसलों पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अल नीनो अत्यधिक मजबूत होता है तो इसका सबसे अधिक असर रबी फसलों पर पड़ सकता है। कम वर्षा और गर्म सर्दी गेहूं, चना, सरसों और अन्य रबी फसलों की उत्पादकता को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा पश्चिम एशिया संकट के कारण उर्वरकों की आपूर्ति और कीमतों पर भी दबाव बना हुआ है, जिससे कृषि लागत बढ़ सकती है।
उर्वरक बाजार से मिली कुछ राहत
हालांकि हाल के दिनों में कुछ सकारात्मक संकेत भी मिले हैं। ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते की उम्मीदों से अंतरराष्ट्रीय उर्वरक कीमतों में नरमी देखने को मिली है। यदि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला सामान्य होती है तो कृषि क्षेत्र को राहत मिल सकती है।
आने वाले महीनों पर टिकी निगाहें
कुल मिलाकर मौजूदा समय में खाद्य कीमतें नियंत्रण में हैं, लेकिन आने वाले महीनों में स्थिति बदल सकती है। अल नीनो की तीव्रता, मानसून का प्रदर्शन, उर्वरकों की उपलब्धता और वैश्विक भू-राजनीतिक हालात यह तय करेंगे कि खाद्य महंगाई कितनी बढ़ती है। फिलहाल विशेषज्ञों की नजर इन सभी कारकों पर टिकी हुई है, क्योंकि इनका सीधा असर किसानों से लेकर आम उपभोक्ताओं तक सभी पर पड़ सकता है।

