नई दिल्ली. लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक के पारित न हो पाने के बाद सियासत तेज हो गई है। सरकार के लिए यह 2014 के बाद पहला बड़ा विधायी झटका माना जा रहा है।
180 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित क्यों नहीं कर देती
विपक्ष ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि अगर वह वास्तव में ‘नारी शक्ति’ की समर्थक है, तो मौजूदा 543 लोकसभा सीटों में से 33 प्रतिशत यानी करीब 180 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित क्यों नहीं कर देती।
शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर सवाल उठाते हुए कहा कि या तो सरकार 2029 के चुनावों में ही 180 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की पहल करे, या फिर जनगणना और परिसीमन से जुड़े प्रावधानों को हटाकर महिला आरक्षण को तुरंत लागू करने का रास्ता बनाए। उन्होंने इसे राजनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा बताया।
कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा और केसी वेणुगोपाल समेत अन्य विपक्षी नेताओं ने भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन के जरिए दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है।
298 सांसदों ने समर्थन और 230 ने विरोध
सरकार की ओर से लाए गए इस संविधान संशोधन विधेयक पर हुए मतदान में 298 सांसदों ने समर्थन और 230 ने विरोध किया। हालांकि इसे पारित होने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत (352 वोट) नहीं मिल सका, जिसके चलते बिल गिर गया।
गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए इसे महिलाओं का अपमान बताया, जबकि संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि विपक्ष ने महिलाओं को उनका हक दिलाने का मौका गंवा दिया है।
