नई दिल्ली. देश के कई हिस्सों में पड़ रही भीषण गर्मी अब डेयरी सेक्टर के लिए नई चुनौती बनती जा रही है। दिल्ली के पास डेयरी किसान नीरज भारद्वाज बताते हैं कि पिछले साल 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान के दौरान उनकी एक गाय ने समय से पहले बछड़े को जन्म दिया। नवजात बछड़ा बेहद कमजोर और लगभग बिना बालों का था। काफी देखभाल और दूध पिलाने के बाद उसकी जान बच सकी। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे मामले जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी से जुड़े व्यापक बदलावों का हिस्सा हैं।
दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक, लेकिन बढ़ रही चुनौतियां
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और वैश्विक दूध उत्पादन में लगभग एक-चौथाई हिस्सेदारी रखता है। देश में डेयरी क्षेत्र करीब 5 प्रतिशत जीडीपी में योगदान देता है और 8 करोड़ से अधिक किसानों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है। बढ़ती आबादी और आय के साथ दूध की मांग लगातार बढ़ रही है। सरकार का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक दूध की मांग लगभग दोगुनी हो सकती है।
गर्मी में 30 फीसदी तक घट जाता है दूध उत्पादन
विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक गर्मी के दौरान पशु कम चारा खाते हैं, जिससे उनका दूध उत्पादन घट जाता है। साथ ही प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है और गर्भपात या मृत जन्म के मामले भी बढ़ते हैं। नीरज भारद्वाज के मुताबिक, अत्यधिक गर्मी के दौरान दूध उत्पादन में करीब 30 प्रतिशत तक गिरावट आ जाती है। दूसरी ओर पशुओं को ठंडा रखने के लिए पानी, बिजली और अन्य संसाधनों पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है, जिससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ता है।
रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद बढ़ रही चिंता
भारत ने 2023-24 वित्त वर्ष में 23.9 करोड़ टन दूध उत्पादन का रिकॉर्ड बनाया, जो पिछले एक दशक में लगभग 64 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। इस उपलब्धि के पीछे उच्च उत्पादकता वाली संकर नस्लों को बढ़ावा देने वाली योजनाओं की बड़ी भूमिका रही है। हालांकि अब बढ़ती गर्मी इस मॉडल की कमजोरियों को उजागर कर रही है।
उच्च उत्पादकता वाली नस्लें अधिक संवेदनशील
राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) के वैज्ञानिकों का कहना है कि अधिक दूध देने वाली संकर नस्लें गर्मी के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं। इन पशुओं का शरीर पहले से ही अधिक गर्मी पैदा करता है, ऐसे में तापमान बढ़ने पर उनकी ऊर्जा दूध उत्पादन और प्रजनन के बजाय शरीर को ठंडा रखने में खर्च होती है। इसके कारण दूध की मात्रा ही नहीं बल्कि उसमें मौजूद वसा और ठोस पदार्थों की मात्रा भी घट जाती है, जिससे किसानों को मिलने वाली कीमत कम हो जाती है।
पशुओं को बचाने के लिए बढ़ रहा निवेश
गर्मी से राहत देने के लिए किसान अब अपने पशुशालाओं में बदलाव कर रहे हैं। नीरज भारद्वाज ने अपने पशु शेड में तिरपाल, वेंटिलेशन और अन्य व्यवस्थाएं लगाने पर करीब दो लाख रुपये खर्च किए हैं। इसके अलावा हर साल रखरखाव पर भी हजारों रुपये खर्च होते हैं। बड़े डेयरी संचालक तो आधुनिक कूलिंग सिस्टम और बेहतर प्रबंधन तकनीकों में निवेश कर रहे हैं, लेकिन छोटे किसानों के लिए यह आसान नहीं है।
छोटे डेयरी किसानों पर सबसे ज्यादा खतरा
डेयरी विशेषज्ञों का मानना है कि दो से चार पशुओं वाले छोटे डेयरी फार्म भविष्य में सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। सीमित पूंजी के कारण ऐसे किसान महंगे कूलिंग सिस्टम या विशेष चारे में निवेश नहीं कर पाते। यदि यही स्थिति बनी रही तो छोटे स्तर की डेयरी गतिविधियां धीरे-धीरे कम हो सकती हैं।
गर्मी से निपटने के लिए नए समाधान तलाश रहे वैज्ञानिक
एनडीआरआई और अन्य संस्थान गर्मी के प्रभाव को कम करने के लिए नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं। इनमें गर्मी सहन करने वाली नई नस्लों का विकास, पशुशालाओं की बेहतर डिजाइन और विशेष आहार रणनीतियां शामिल हैं। हाल ही में वैज्ञानिकों ने ऐसी नस्ल विकसित की है जो अधिक तापमान में भी दूध उत्पादन बनाए रखने में सक्षम मानी जा रही है।
भैंसों पर भी बढ़ रहा संकट
भारत के कुल दूध उत्पादन में भैंसों की हिस्सेदारी लगभग आधी है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार भैंसें अत्यधिक गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। पहले जहां उन्हें कुछ महीनों तक ही पानी में रहने या ठंडक की जरूरत पड़ती थी, वहीं अब मार्च से नवंबर तक अतिरिक्त कूलिंग व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
बीमा कंपनियां भी बदल रही रणनीति
बार-बार पड़ रही हीटवेव का असर अब ग्रामीण बीमा बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। कई कंपनियां पशुओं में गर्मी से होने वाले नुकसान को कवर करने वाली विशेष बीमा योजनाएं शुरू कर रही हैं। इन योजनाओं में तय सीमा से अधिक तापमान होने पर किसानों को स्वतः मुआवजा दिया जाता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल बीमा समाधान नहीं है, बल्कि किसानों को जलवायु अनुकूल तकनीकों को अपनाना भी जरूरी होगा।
जलवायु परिवर्तन बन रहा डेयरी कारोबार की सबसे बड़ी चुनौती
किसानों और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने दूध उत्पादन में वैश्विक नेतृत्व जरूर हासिल किया है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति वह सबसे संवेदनशील देशों में भी शामिल है। बढ़ती गर्मी, घटती उत्पादकता और बढ़ती लागत आने वाले वर्षों में डेयरी क्षेत्र के सामने बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ जलवायु अनुकूल डेयरी मॉडल विकसित करना समय की सबसे बड़ी जरूरत माना जा रहा है।
