नई दिल्ली: दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई। अदालत ने मामले में चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग और दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने उन मतदाताओं के नाम और उन्हें नोटिस भेजने के स्पष्ट कारण सार्वजनिक नहीं किए, जिन्हें SIR प्रक्रिया के तहत जांच के दायरे में रखा गया है।
47 लाख से ज्यादा नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत के सामने SIR प्रक्रिया से जुड़ी चिंताएं रखीं। उन्होंने कहा कि दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 47.56 लाख नाम शामिल नहीं किए गए हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इन नामों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट यानी ASDD श्रेणियों में रखा गया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद अब लाखों मतदाताओं को नोटिस भेजे जा रहे हैं। इन नोटिस में कुछ मतदाताओं को ‘No Mapping’ और कुछ को ‘Logical Discrepancies’ जैसी श्रेणियों में रखा गया है।
करीब 33 लाख मतदाताओं को नोटिस का मुद्दा
अदालत के सामने बताया गया कि करीब 33 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट रोल में मौजूद हैं, लेकिन उनके रिकॉर्ड को लेकर विसंगतियां चिन्हित की गई हैं। इनमें करीब 13.8 लाख मतदाता ‘No Mapping’ और लगभग 19.3 लाख ‘Logical Discrepancies’ श्रेणी में बताए गए हैं। याचिका में इन श्रेणियों के आधार और इस्तेमाल किए गए मानकों को सार्वजनिक करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि किसी मतदाता को यह स्पष्ट जानकारी ही नहीं होगी कि उसके रिकॉर्ड में किस तरह की समस्या बताई गई है, तो उसके लिए नोटिस का जवाब देना मुश्किल हो सकता है। इसी आधार पर याचिका में नोटिस पाने वाले मतदाताओं की सूची और नोटिस जारी करने के कारणों को सार्वजनिक करने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करने के तरीके पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने मतदाताओं को भेजे जा रहे नोटिस की प्रक्रिया पर भी सवाल किए। रिपोर्टों के मुताबिक अदालत ने नोटिस को लेकर कहा कि वे कंप्यूटर से तैयार किए गए प्रतीत होते हैं। कोर्ट ने चुनाव आयोग से शिकायतों की जांच करने को भी कहा।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू पेश हुए।
चुनाव आयोग ने बताया कितने अधिकारी कर रहे काम
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि SIR प्रक्रिया के तहत कितने बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO और चुनाव पंजीकरण अधिकारी यानी ERO तैनात किए गए हैं। चुनाव आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि करीब 14,000 BLO और 1,200 ERO इस प्रक्रिया में लगाए गए हैं।
चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि प्रक्रिया पूरी करने की निर्धारित समयसीमा 29 अक्टूबर है और जरूरत पड़ने पर समय बढ़ाने के लिए तैयार है। आयोग ने अदालत को भरोसा दिलाया कि किसी पात्र मतदाता का नाम हटाया नहीं जाएगा।
नोटिस मिलने का मतलब नाम कटना नहीं
चुनाव आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि SIR के तहत नोटिस जारी होना अपने आप में किसी मतदाता को अपात्र घोषित करना नहीं है। संबंधित मतदाता को अपनी स्थिति स्पष्ट करने और जरूरी दस्तावेज या जानकारी देने का अवसर मिलता है। इसके बाद दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया के आधार पर अंतिम मतदाता सूची तैयार की जाएगी।
दिल्ली में SIR की प्रक्रिया के तहत दावे और आपत्तियां दाखिल करने की प्रक्रिया 30 सितंबर तक चलनी है। इसके बाद नोटिस से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए 29 अक्टूबर तक का समय निर्धारित है और अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर को प्रकाशित किए जाने की योजना है।
चुनाव आयोग के जवाब के बाद आगे बढ़ेगा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने अब चुनाव आयोग से दो सप्ताह में जवाब मांगा है। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह है कि SIR के दौरान नोटिस पाने वाले मतदाताओं को पर्याप्त जानकारी किस तरह दी जा रही है और ‘Logical Discrepancies’ जैसी श्रेणियों के लिए इस्तेमाल किए गए मानदंड कितने स्पष्ट हैं। आयोग के जवाब और आगे की सुनवाई में इस प्रक्रिया से जुड़े इन पहलुओं पर अदालत में चर्चा होने की उम्मीद है।
