नई दिल्ली. UPI के जरिए होने वाले कुछ बड़े कारोबारी भुगतानों पर प्रस्तावित Merchant Discount Rate (MDR) को लेकर मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। केंद्र सरकार की ओर से 2,000 रुपये से अधिक के कुछ Person-to-Merchant (P2M) UPI लेनदेन पर MDR लागू करने के फैसले को चुनौती देते हुए जनहित याचिका दाखिल की गई है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सोमवार, 28 सितंबर 2026 को सुनवाई प्रस्तावित है। नया शुल्क ढांचा 15 अक्टूबर 2026 से लागू होना निर्धारित है।
2000 रुपये से ज्यादा के UPI भुगतान पर कितना लगेगा शुल्क?
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के पात्र मर्चेंट UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लगाया जाएगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर यह शुल्क अधिकतम 300 रुपये तक सीमित रहेगा। हालांकि, Person-to-Person यानी P2P UPI ट्रांसफर इस व्यवस्था से बाहर रहेंगे। वहीं 2,000 रुपये तक के मर्चेंट भुगतान पर भी MDR नहीं लगाया जाएगा।
यह व्यवस्था जनवरी 2020 से लागू निर्दिष्ट UPI लेनदेन के लिए शून्य-MDR व्यवस्था में बदलाव करेगी। अधिसूचित ढांचे के मुताबिक इस शुल्क का भुगतान ग्राहकों के बजाय मर्चेंट्स को करना होगा।
रेलवे, टेलीकॉम और ईंधन जैसे क्षेत्रों के लिए अलग नियम
नई व्यवस्था में कुछ ऐसे क्षेत्रों के लिए अलग प्रावधान किए गए हैं, जिन्हें जरूरी सेवाओं या कम मार्जिन वाले कारोबार के तौर पर चिन्हित किया गया है। रेलवे, टेलीकॉम, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट से जुड़े 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर 5 रुपये का फ्लैट MDR प्रस्तावित है।
वहीं म्यूचुअल फंड और सिक्योरिटीज से जुड़े भुगतान तथा स्टॉकब्रोकर और डीलरों के जरिए किए जाने वाले लेनदेन पर 0.02 प्रतिशत MDR रखा गया है। इन मामलों में भी शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी।
P2P ट्रांजेक्शन पर नहीं लगेगा MDR
प्रस्तावित ढांचे में Person-to-Person यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले UPI भुगतान पर किसी भी राशि के लिए MDR नहीं लगेगा। रिपोर्ट में उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, P2P ट्रांसफर UPI के कुल लेनदेन वॉल्यूम का करीब 37 प्रतिशत और कुल ट्रांजेक्शन वैल्यू का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा हैं।
याचिका में क्या दलील दी गई?
अधिवक्ता अंजन दत्ता की ओर से दाखिल जनहित याचिका में केंद्र की 14 सितंबर की अधिसूचना और 15 सितंबर को घोषित MDR व्यवस्था को चुनौती दी गई है। याचिका में दावा किया गया है कि यह शुल्क पर्याप्त कानूनी सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लागू किया गया। याचिका में Payment and Settlement Systems Act, 2007 की संशोधित धारा 10A की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठाया गया है।
याचिका में यह तर्क दिया गया है कि इस प्रावधान के तहत कार्यपालिका को यह तय करने का व्यापक अधिकार मिलता है कि किन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणालियों को शुल्क से सुरक्षा मिलनी चाहिए। याचिकाकर्ता ने UPI की तुलना RuPay डेबिट कार्ड से भी की है और कहा है कि RuPay लेनदेन के लिए बिना किसी समान मौद्रिक सीमा के शुल्क-मुक्त सुरक्षा जारी है।
मर्चेंट्स पर बढ़ सकता है लागत का दबाव, याचिका में दावा
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि MDR लागू होने से मर्चेंट्स की लागत बढ़ सकती है, खासकर उन कारोबारों पर जिनका मुनाफा पहले से कम है। याचिकाकर्ता ने यह आशंका भी जताई है कि इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव ग्राहकों और डिजिटल भुगतान को अपनाने पर पड़ सकता है। हालांकि, ये याचिका में किए गए तर्क हैं और इन पर अंतिम विचार सुप्रीम कोर्ट को करना है।
याचिका में 2,000 रुपये से अधिक के UPI मर्चेंट लेनदेन पर लागू MDR व्यवस्था को रद्द या निलंबित करने की मांग की गई है। वैकल्पिक रूप से पारदर्शी परामर्श, संबंधित आंकड़ों के प्रकाशन और प्रभाव के आकलन के बाद व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा की मांग की गई है।
MSME और छोटे कारोबारों के लिए सुरक्षा की मांग
याचिका में माइक्रो और स्मॉल एंटरप्राइजेज के लिए भी सुरक्षा उपायों की मांग की गई है। इसमें भविष्य में MDR की श्रेणियां तय करते समय कारोबारी टर्नओवर, MSME की स्थिति, वास्तविक मुनाफे के मार्जिन, भौगोलिक स्थिति और शुल्क वहन करने की क्षमता जैसे पहलुओं पर विचार करने की बात कही गई है।
इस मामले में केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक समेत अन्य पक्ष प्रतिवादी हैं। सुप्रीम कोर्ट की 28 सितंबर की कॉज लिस्ट के मुताबिक मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ करेगी। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं।
सर्वे में कारोबारियों की MDR को लेकर अलग-अलग राय
रिपोर्ट में LocalCircles के एक सर्वे का भी उल्लेख किया गया है। इस सर्वे में 242 जिलों के मर्चेंट्स और कारोबारियों से 32,796 प्रतिक्रियाएं ली गईं। इनमें 48 प्रतिशत प्रतिक्रियाएं टियर-1 जिलों, 33 प्रतिशत टियर-2 जिलों और 19 प्रतिशत टियर-3 व टियर-4 जिलों से आईं।
सर्वे के मुताबिक, केवल 17 प्रतिशत कारोबारियों ने कहा कि वे 2,000 रुपये से अधिक के UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत या उससे ज्यादा MDR देने के लिए तैयार हैं। वहीं 41 प्रतिशत ने किसी भी तरह का MDR देने से इनकार किया। करीब 9 प्रतिशत कारोबारियों ने बताया कि वे UPI भुगतान स्वीकार ही नहीं करते।
शुल्क देने को तैयार कारोबारियों में 15 प्रतिशत ने 0.04 प्रतिशत तक MDR स्वीकार करने की बात कही। वहीं 8 प्रतिशत ने 0.25 प्रतिशत तक शुल्क को स्वीकार्य बताया। 5-5 प्रतिशत कारोबारियों ने 0.1 प्रतिशत, 0.2 प्रतिशत और 0.5 प्रतिशत तक MDR स्वीकार करने की बात कही, जबकि 12 प्रतिशत ने कहा कि वे 1 प्रतिशत तक MDR वहन कर सकते हैं।
15 अक्टूबर की प्रस्तावित लागू तारीख नजदीक आने के बीच सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इस नई UPI मर्चेंट शुल्क व्यवस्था के कानूनी आधार और प्रावधानों की न्यायिक समीक्षा का महत्वपूर्ण चरण होगी।
