नई दिल्ली. कमजोर और असमान मानसून के कारण राजस्थान में इस साल करीब एक दशक के सबसे गंभीर सूखे की स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है। शुरुआती सर्वे के अनुसार राज्य के 11 से ज्यादा जिले सूखे जैसी परिस्थितियों से प्रभावित हैं। इनमें तीन जिलों में सामान्य से 50 प्रतिशत तक कम बारिश दर्ज की गई है। बारिश की कमी का असर खेती, पेयजल और सिंचाई के साथ-साथ पशुओं के चारे पर भी पड़ने की आशंका है।
3 जिलों में सबसे ज्यादा बारिश की कमी
प्रारंभिक रिपोर्टों के मुताबिक पाली, जैसलमेर और जालोर सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में शामिल हैं। इन जिलों के अधिकांश तहसीलों में कम बारिश के कारण किसानों को नुकसान उठाना पड़ा है। इसके अलावा बांसवाड़ा, सिरोही, हनुमानगढ़, उदयपुर, राजसमंद, बालोतरा, भीलवाड़ा और जोधपुर की कई तहसीलों में भी सूखे जैसे हालात बताए जा रहे हैं।
राज्य में इस साल औसतन बारिश सामान्य से करीब 19 प्रतिशत कम रही है। हालांकि मौसम विभाग कुछ जिलों को सामान्य श्रेणी में रखता है, लेकिन वहां भी बारिश सामान्य से कम रही है।
अगले साल पानी की ट्रेन चलाने की नौबत?
बारिश की कमी का सीधा असर बांधों में पानी के भंडारण पर पड़ा है। पिछले मानसून के बाद राजस्थान के बांधों में उनकी कुल क्षमता का करीब 90.5 प्रतिशत पानी था, जबकि इस बार मानसून के बाद यह आंकड़ा लगभग 62 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है।
जोधपुर क्षेत्र में स्थिति और गंभीर बताई जा रही है। यहां बांधों में फिलहाल करीब 16 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है, जबकि पिछले साल मानसून के बाद यह स्तर 80 प्रतिशत से अधिक था। ऐसे हालात में अगले साल गर्मियों के दौरान कुछ जिलों में पेयजल संकट बढ़ सकता है। आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों ने कुछ इलाकों में Water Train चलाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया है। वर्ष 2022 में पाली में पानी की आपूर्ति के लिए जोधपुर से Water Train भेजी गई थी।
किसानों की मुश्किल बढ़ी, खरीफ फसलों को नुकसान
कम बारिश का असर राजस्थान की प्रमुख खरीफ फसलों पर भी पड़ा है। बाजरा, ग्वार, मूंग, मोठ और सोयाबीन जैसी फसलों को नुकसान होने की रिपोर्ट है। इससे किसानों की आय प्रभावित होने के साथ आने वाले समय में खाद्यान्न की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
राज्य में उत्पादन कम होने पर दूसरे राज्यों से अनाज और अन्य जरूरी खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति करनी पड़ सकती है। पशु चारे की उपलब्धता को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। चारे की कीमत बढ़ने पर दूध और डेयरी उत्पादों की लागत भी बढ़ सकती है।
सर्वे के बाद तय होगी सूखा प्रभावित क्षेत्रों की संख्या
राज्य के प्रभावित इलाकों में पटवारियों की टीमें फसल और बारिश की स्थिति का सर्वे कर रही हैं। सर्वे का अंतिम चरण चल रहा है। जिला कलेक्टरों की ओर से फसल नुकसान और अभावग्रस्त क्षेत्रों की रिपोर्ट तैयार कर राजस्व विभाग
तथा आपदा प्रबंधन विभाग को भेजी जाएगी।
15 अक्टूबर के बाद इन रिपोर्टों के आधार पर सूखा प्रभावित जिलों और तहसीलों की स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है। इसके बाद सरकार आधिकारिक तौर पर प्रभावित क्षेत्रों की सूची जारी करेगी।
पिछले साल की तुलना में इस बार हालात अलग
पिछले मानसून की तुलना में इस साल बारिश का पैटर्न काफी अलग रहा है। पिछले वर्ष राज्य के 23 जिलों में सामान्य से 60 प्रतिशत से ज्यादा बारिश दर्ज की गई थी। वहीं इस बार किसी भी जिले में पूरे मानसून के दौरान इतनी अधिक बारिश नहीं हुई। इस साल 24 जिलों में बारिश को मौसम विभाग ने सामान्य श्रेणी में रखा है, जबकि 14 जिलों में बारिश सामान्य से कम रही है। सामान्य श्रेणी में आने वाले 24 जिलों में भी 18 जिलों में बारिश सामान्य से कम दर्ज की गई है।
सिर्फ तीन जिलों में सामान्य से ज्यादा बारिश
राजस्थान के 41 जिलों में से केवल धौलपुर, डीग और सलूम्बर में सामान्य से करीब 24 से 28 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई है। इसके मुकाबले पिछले मानसून में 17 जिलों में सामान्य से 20 प्रतिशत से अधिक बारिश हुई थी।
मौसम विभाग के अनुसार इस बार मानसून के कमजोर रहने का अनुमान पहले ही लगाया गया था। जून और जुलाई में बारिश अपेक्षाकृत सामान्य रही, लेकिन अगस्त और सितंबर में बारिश में काफी कमी आई। मानसून की असमान स्थिति के कारण कुछ इलाकों में पानी की उपलब्धता बेहद कम रह गई।
सरकार ने शुरू किए राहत के इंतजाम
बारिश की कमी को देखते हुए राज्य सरकार ने कई राहत उपाय शुरू किए हैं। टैंकरों के जरिए पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था को 31 दिसंबर तक बढ़ा दिया गया है। कम बारिश वाले क्षेत्रों में जिला कलेक्टरों को राहत कार्यों के लिए एक-एक करोड़ रुपये तक की राशि स्वीकृत करने का अधिकार दिया गया है।
पशु चारे की संभावित कमी को देखते हुए बाड़मेर, बालोतरा, जैसलमेर और आसपास के जिलों में नए चारा डिपो खोलने के निर्देश भी दिए गए हैं। सरकार की नजर अब फसल नुकसान, पेयजल उपलब्धता और बांधों में बचे पानी की स्थिति पर है। पटवारी सर्वे और जिला रिपोर्ट आने के बाद ही सूखे की वास्तविक स्थिति और प्रभावित क्षेत्रों की संख्या की आधिकारिक तस्वीर सामने आएगी।
