नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने शनिवार को कहा कि राज्यों और केंद्र सरकार के बीच बढ़ते कानूनी टकराव भारत की संवैधानिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत हैं। उन्होंने आगाह किया कि इस तरह के विवाद ‘सहकारी संघवाद’ (Cooperative Federalism) की भावना को कमजोर करते हैं और संस्थागत संतुलन पर प्रतिकूल असर डालते हैं।
पटना स्थित चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (CNLU) में आयोजित ‘डॉ. राजेंद्र प्रसाद मेमोरियल लेक्चर’ को संबोधित करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि एक “परिपक्व संघीय व्यवस्था” को अदालतों में प्रतिद्वंद्वी की तरह खड़े होने के बजाय संवाद, वार्ता और मध्यस्थता का रास्ता अपनाना चाहिए।
राज्यों और केंद्र के बीच बढ़ते विवाद शुभ संकेत नहीं
जस्टिस नागरत्ना ने अपने संबोधन में कहा कि राज्यों के बीच या केंद्र और राज्यों के बीच संघर्ष में वृद्धि देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। उनके अनुसार, इस प्रकार के विवाद संवैधानिक शासन प्रणाली में दरार पैदा करते हैं और इन्हें हर संभव तरीके से टाला जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब राज्य एक-दूसरे के खिलाफ या केंद्र सरकार के खिलाफ अदालतों में मुकदमे दायर करने लगते हैं, तो यह किसी मजबूती का नहीं, बल्कि सहकारी संघवाद के कमजोर पड़ने का संकेत है।
‘राज्य, केंद्र के अधीन नहीं बल्कि संवैधानिक सह-भागीदार हैं’
जस्टिस नागरत्ना ने केंद्र सरकार की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केंद्र को राज्यों को अधीनस्थ नहीं, बल्कि संवैधानिक साझेदार के रूप में देखना चाहिए।
उन्होंने कहा,
“भारतीय संविधान को संघीय ढांचे और एकात्मक भावना वाला कहा जाता है, लेकिन केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का ऊर्ध्वाधर विभाजन कोई पदानुक्रम नहीं है। यह सह-समकक्षों (co-equals) की संवैधानिक व्यवस्था है।”
कई संवैधानिक विवादों में उलझा है सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस नागरत्ना की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष केंद्र-राज्य संबंधों और विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामले लंबित हैं।
इनमें शामिल हैं—
विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को चुनौती,
पश्चिम बंगाल सरकार और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के बीच कथित टकराव से जुड़ा मामला,
राज्यपालों की शक्तियों से जुड़े विवाद, खासकर
विधेयकों को मंजूरी,
कुलपतियों की नियुक्ति,
और संवैधानिक अधिकार-क्षेत्र के प्रश्न।
इन मुद्दों ने केंद्र, राज्य सरकारों और संवैधानिक पदों के बीच बढ़ती खींचतान को फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।
‘शक्तियों का पृथक्करण लोकतंत्र की आधारशिला’
अपने व्याख्यान में जस्टिस नागरत्ना ने ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) के सिद्धांत को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि यह सिद्धांत लोकतांत्रिक शासन का मूल आधार है, क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि राज्य का कोई भी अंग अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न करे। उन्होंने कहा कि संविधान के तहत बनी संस्थाओं का उद्देश्य केवल स्वतंत्र रूप से काम करना नहीं है, बल्कि वे एक-दूसरे पर निगरानी, संतुलन और आवश्यक होने पर नियंत्रण भी बनाए रखें, ताकि लोकतांत्रिक जवाबदेही कायम रह सके।
संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत मर्यादा पर दिया जोर
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि शासन संस्थाओं की वैधता केवल कानूनी अधिकारों से नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और नैतिकता के पालन से भी तय होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका-तीनों को अपने-अपने निर्धारित दायरे में रहकर काम करना चाहिए और एक-दूसरे की संवैधानिक भूमिकाओं का सम्मान करना चाहिए। यदि यह संतुलन कमजोर होता है, तो कानून के शासन (Rule of Law) पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
कार्यक्रम में कई गणमान्य लोग रहे मौजूद
इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू तथा CNLU के कुलपति फैजान मुस्तफा भी उपस्थित रहे। जस्टिस बीवी नागरत्ना का यह वक्तव्य केवल केंद्र-राज्य संबंधों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत मजबूती, संवैधानिक मर्यादा और शासन के संतुलित ढांचे पर एक गंभीर चेतावनी भी था। उनका स्पष्ट संदेश था कि संविधान की मजबूती टकराव से नहीं, बल्कि संवाद, संतुलन और संवैधानिक अनुशासन से बनी रहती है।
