नई दिल्ली. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्य कांत ने कहा है कि देश के हर नागरिक को अदालतों के फैसले अपनी मातृभाषा या राज्य की भाषा में पढ़ने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि सभी संवैधानिक संस्थाओं को संविधान की भावना के अनुरूप काम करना चाहिए, ताकि न्याय व्यवस्था आम लोगों के लिए ज्यादा सुलभ और समझने योग्य बन सके।
हिंदी सेवा निधि कार्यक्रम में CJI का संबोधन
उत्तर प्रदेश के इटावा में आयोजित हिंदी सेवा निधि ट्रस्ट के 33वें वार्षिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए CJI ने कहा कि संविधान में भाषा से जुड़े जो प्रावधान किए गए हैं, उन्हें देशभर में प्रभावी ढंग से लागू करने की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने कहा कि भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि न्याय तक पहुंच (Access to Justice) का एक अहम ज़रिया है।
सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेज़ी, लेकिन बदलाव की पहल
मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के तहत सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक भाषा फिलहाल अंग्रेज़ी ही है। हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि भाषाई दूरी को कम करने के लिए बड़े कदम उठाए जा चुके हैं।
CJI के अनुसार:
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का 16 भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जा रहा है
हर नागरिक को अपने राज्य की भाषा में प्रमाणित (Authenticated) अनुवादित प्रति पढ़ने का अधिकार मिलना चाहिए
इससे न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वास दोनों बढ़ेंगे
आम नागरिकों के लिए क्यों अहम है यह पहल?
कई बार अदालतों के फैसले कठिन कानूनी भाषा और अंग्रेज़ी में होने के कारण आम लोगों तक सही तरीके से नहीं पहुंच पाते। ऐसे में:
क्षेत्रीय भाषाओं में फैसले मिलने से कानूनी जागरूकता बढ़ेगी
आम नागरिक अपने अधिकार और कर्तव्यों को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे
न्याय प्रणाली ज्यादा जन-हितैषी (Citizen-Friendly) बनेगी
CJI जस्टिस सूर्य कांत का यह बयान ऐसे समय आया है, जब देश में भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने और न्याय तक समान पहुंच को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसलों का बहुभाषी अनुवाद न सिर्फ संविधान की भावना को मजबूत करता है, बल्कि लोकतंत्र को भी और सशक्त बनाता है।
