नई दिल्ली: चुनाव आयोग की मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की गई है। याचिका में SIR प्रक्रिया के दौरान कथित तौर पर वैधानिक जिम्मेदारियों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अभियोजन शुरू करने की मांग की गई है। यह याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की है। इसमें दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के भीतर अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना कुछ फैसले, दिशानिर्देश और सॉफ्टवेयर में बदलाव किए गए। याचिकाकर्ता ने इन कदमों को असंवैधानिक घोषित कर रद्द करने की मांग भी की है।
किन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग?
याचिका में CEC ज्ञानेश कुमार के साथ वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त मनीष गर्ग और चुनाव आयोग की आईटी प्रमुख सीमा खन्ना समेत उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है, जिनकी कथित भूमिका जांच में सामने आ सकती है। याचिकाकर्ता ने Representation of the People Act, 1950 की धारा 32 का हवाला देते हुए सक्षम प्राधिकारी को शिकायत दर्ज करने और कथित वैधानिक उल्लंघनों को लेकर अभियोजन शुरू करने का निर्देश देने की मांग की है। यह धारा मतदाता सूचियों की तैयारी, संशोधन या सुधार से जुड़े कुछ आधिकारिक कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए दंड से संबंधित है।
Form 6 में बदलाव बना विवाद का अहम मुद्दा
याचिका में सबसे प्रमुख सवाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में किए गए कथित बदलाव को लेकर उठाया गया है। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2026 में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने Form 6 में बदलाव पर आपत्ति दर्ज की थी। उनका कहना था कि यह एक वैधानिक फॉर्म है और इसे बदलने के लिए Registration of Electors Rules, 1960 में आवश्यक संशोधन किया जाना चाहिए। बाद में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई थी।
रिपोर्ट के अनुसार, इसके बावजूद ECINet पोर्टल पर Form 6 में SIR से जुड़ी जानकारी शामिल की गई। इसमें आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पहले की SIR मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि संबंधित घोषणा को अनिवार्य नहीं बताया गया था, लेकिन इसे भरे बिना ऑनलाइन फॉर्म आगे जमा नहीं किया जा सकता था। बाद में संधू ने इस बदलाव को कथित तौर पर “अनधिकृत” और “अवैध” बताया था।
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का भी जिक्र
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में चुनाव आयोग के भीतर सामने आई कथित असहमति को भी आधार बनाया गया है। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीने के दौरान आयोग से जुड़े विभिन्न फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। इनमें Form 6 में बदलाव के अलावा मतदाता सूची के डेटा के केंद्रीकरण, मतदाताओं के नाम हटाने और पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
हालांकि, चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों ने इन रिपोर्टों के बाद कहा है कि SIR समेत आयोग द्वारा लिए गए फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से और सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से उठाए गए सवाल मुख्य रूप से ड्राफ्ट स्तर पर दिए गए सुझाव और प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा थे। इसलिए इस मामले में याचिका में लगाए गए आरोपों और चुनाव आयोग के आधिकारिक पक्ष के बीच अंतर बना हुआ है।
चुनाव आयोग के फैसलों को बहुमत के आधार पर तय करने की मांग
याचिकाकर्ता ने उन फैसलों, निर्देशों, दिशानिर्देशों और सॉफ्टवेयर बदलावों को भी चुनौती दी है, जिनके बारे में दावा किया गया है कि उन्हें पूर्ण आयोग की सहमति के बिना शुरू या लागू किया गया। याचिका में Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की धारा 18 का हवाला देते हुए कहा गया है कि यदि CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी विषय पर मतभेद हो, तो निर्णय बहुमत की राय के आधार पर होना चाहिए।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से यह घोषित करने का अनुरोध किया गया है कि पूर्ण आयोग की सहमति या बहुमत की राय के विपरीत लिए गए ऐसे फैसले संवैधानिक और कानूनी रूप से वैध नहीं माने जाएं। हालांकि, इन दावों पर अंतिम कानूनी स्थिति अदालत के विचार और आदेश के बाद ही स्पष्ट होगी।
SIR के दौरान वोटर डेटा को लेकर SIT जांच की मांग
याचिका में मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस और SIR के दौरान हुए कथित बदलावों की स्वतंत्र जांच की भी मांग की गई है। इसके लिए एक Judicial Inquiry Commission या Special Investigation Team (SIT) गठित करने का अनुरोध किया गया है। प्रस्तावित जांच टीम की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से कराने और उसमें साइबर सुरक्षा तथा सूचना प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग की गई है।
याचिका में दावा किया गया है कि SIR प्रक्रिया के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 13 करोड़ नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से हटाए गए। याचिकाकर्ता ने इन नामों को हटाए जाने की प्रक्रिया, संबंधित डिजिटल सिस्टम और डेटाबेस के संचालन की स्वतंत्र जांच की मांग की है। हालांकि, 13 करोड़ नामों से संबंधित यह आंकड़ा याचिका में किया गया दावा है और इसे जांच या अदालत के निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता। Indian Express ने भी अपनी रिपोर्ट में SIR के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट रोल से हटाए जाने की बात कही थी।
पुराने Form 6 को बहाल करने की मांग
याचिका में ECINet और ERONet पोर्टल पर Form 6 में किए गए बदलावों को रद्द करने और Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित मूल Form 6 को बहाल करने की मांग भी की गई है। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने 1 अक्टूबर 2025 से ECINet और ERONet से संबंधित सर्वर लॉग, डेटाबेस, आधिकारिक संचार और मेटाडेटा को सुरक्षित रखने का निर्देश देने का अनुरोध किया है, ताकि किसी संभावित जांच के दौरान डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध रह सकें।
SIR को लेकर पहले से जारी है विवाद
यह याचिका ऐसे समय सामने आई है जब SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक और कानूनी सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में सामने आई रिपोर्टों में चुनाव आयुक्तों के बीच कुछ मुद्दों पर आपत्तियों का उल्लेख किया गया था। इसके बाद चुनाव आयोग ने कहा कि SIR समेत सभी फैसले पूर्ण आयोग की सहमति से लिए गए हैं। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता ने इन्हीं कथित मतभेदों और दस्तावेजों को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट से मामले की न्यायिक जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। अब इस याचिका पर अदालत की कार्यवाही और उसमें दिए जाने वाले निर्देश यह तय करेंगे कि लगाए गए आरोपों पर आगे किस तरह की कानूनी जांच या कार्रवाई होती है।

