पीआईएल को सुलभ बनाने वाले पूर्व मुख्य न्यायाधीश पीएन भगवती का निधन

भारत के 17वें मुख्य न्यायाधीश प्रफुल्लचंद्र नटवरलाल भगवती का गुरूवार को दिल्ली में निधन हो गया. वे 95 वर्ष के थे. उनका अंतिम संस्कार 17 जून को शाम चार बजे लोधी कॉलोनी के विद्ययुत शवदाह गृह में किया जाएगा. उनके निधन पर प्रधानमंत्री ने ट्वीट करके शोक जताया है।

प्रधानमंत्री ने अपने ट्वीट में कहा “न्यायायिक व्यवस्था को सुलभ बनाने व  करोड़ोंं लोगों को आवाज देने में पीएन भगवती का उल्लेखनीय योगदान है.”

जस्टिस भगवती को जनहित याचिका(पीआईएल) के वर्तमान स्वरूप के लिए याद किया जाता है. उन्होनें वर्ष 1986 में ‘लोकस स्टैंडाई’ यानी केस से जुड़े होने की शर्त को; अपील करने के लिए जरूरी शर्त से हटा दिया था. उन्होनें पिछड़े और सुविधाविहीन लोगों के हितों की रक्षा के लिए यह न्यायायिक सुधार लाया था. इसके बाद कोई भी व्यक्ति मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट में अपील कर सकता था चाहे वह मामला उसके निजी जीवन से जुड़ा न भी हो.

मेनका गांधी पासपोर्ट मामले में उन्होने अनुच्छेद 21 में दिए गए ‘जीवन के अधिकार’ की व्याख्या की थी. इस मामले में उन्होंने आदेश दिया था कि किसी भी व्यक्ति को कहीं आने-जाने से नहीं रोका जा सकता है. इस फैसले में उन्होने पासपोर्ट रखना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार बताया था. इस फैसले के बाद जीवन के अधिकार को ‘सम्मान के साथ जीवन’ के अधिकार की तरह देखा जाने लगा.

जस्टिस भगवती 1973 से 1986 तक सर्वोच्च न्यायालय के जज रहे. उन्होंने आखिर के डेढ़ सालोंं में मुख्य न्यायाधीश का पद भी संभाला.

जस्टिस भगवती मुंबई स्थित गर्वमेंट लॉ कॉलेज से स्नातक करने के बाद बाम्बे हाइकोर्ट से वकालत की शुरूआत की थी. वे 1960 में गुजरात हाई कोर्ट के जज और 1967 में मुख्य न्यायाधीश बने.

टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए गए साक्षात्कार का एक अंश
(साभार- TOI)

हालांकि जस्टिस भगवती विवादों में भी रहे. 1976 में लगाये गए आपातकाल के दौरान ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण पीठ’ के संबंधित पीठ के हिस्सा रहे. फैसले के 30 साल के बाद उन्होनें इस दौरान दिए फैसलों पर अफसोस जताया था. अंग्रेजी दैनिक अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए गए एक इंटरव्यू में जस्टिस भगवती ने सत्य सांई को भगवान माना. उन्होनें कहा था कि उनके सभी फैसले भगवान(सांईबाबा) के द्वारा निर्देशित और मार्गदर्शन पाते हैं. उन्होनें कहा था कि वे अपने फैसले में वही लिखते हैं जो उनके भगवान उन्हे बोलते हैं.

जस्टिस भगवती के परिवार में पत्नी और तीन पुत्रियां हैं. जस्टिस भगवती ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी भााग लिया था और 1942 में गिरफ्तार भी हुए थे.