नई दिल्ली: देश की राजनीति में लगातार हो रहे दलबदल और विपक्षी दलों में बढ़ती अंदरूनी खींचतान के बीच भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन को उम्मीद है कि आगामी मानसून सत्र तक वह संविधान संशोधन के लिए जरूरी संख्या जुटाने की स्थिति में पहुंच सकता है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि केंद्र सरकार आने वाले समय में दो बड़े संवैधानिक बदलावों को आगे बढ़ाना चाहती है। इनमें महिलाओं के लिए विधायिकाओं में आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने वाला प्रावधान और ‘एक देश, एक चुनाव’ व्यवस्था को लागू करने के लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधन शामिल हैं। इन दोनों प्रस्तावों के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी।
लोकसभा में अभी भी दूर है लक्ष्य
लोकसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 540 मानी जाए तो किसी भी संवैधानिक संशोधन को पारित कराने के लिए लगभग 360 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा। वर्तमान में NDA के पास 293 सांसद हैं। हालांकि हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और संभावित दलबदल को देखते हुए गठबंधन को अपनी संख्या बढ़ने की उम्मीद है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यदि कुछ विपक्षी दलों के सांसद NDA के साथ आते हैं तो संख्या 319 तक पहुंच सकती है, लेकिन इसके बावजूद दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा अभी भी दूर रहेगा। इसी कारण भाजपा की नजर उन दलों पर है जहां अंदरूनी असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं।
राज्यसभा में मजबूत हो रही स्थिति
लोकसभा की तुलना में राज्यसभा में NDA की स्थिति अधिक मजबूत दिखाई दे रही है। हाल के राजनीतिक बदलावों और चुनावी नतीजों के बाद गठबंधन का आंकड़ा 152 तक पहुंच गया है। राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए लगभग 164 सदस्यों का समर्थन आवश्यक माना जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि रिक्त सीटों पर भाजपा को अपेक्षित सफलता मिलती है और कुछ क्षेत्रीय दल मुद्दों के आधार पर समर्थन देते हैं तो उच्च सदन में सरकार संवैधानिक संशोधन पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या के काफी करीब पहुंच सकती है।
परिसीमन पर क्यों है जोर?
केंद्र सरकार का तर्क है कि देश में संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन लंबे समय से लंबित है। वर्तमान में कई निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं 1971 की जनगणना के आधार पर तय हैं, जबकि जनसंख्या में पिछले दशकों में भारी बदलाव आया है।
सरकार का कहना है कि जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए परिसीमन जरूरी है। वहीं विपक्षी दलों को आशंका है कि नए परिसीमन से कुछ क्षेत्रों में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं और इसका लाभ भाजपा को मिल सकता है।
इसी वजह से परिसीमन का मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में बना हुआ है। विपक्षी दलों का आरोप है कि नए निर्वाचन क्षेत्रों की संरचना राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर की जा सकती है, जबकि सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही है।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ भी प्राथमिकता में
भाजपा लंबे समय से लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की पक्षधर रही है। पार्टी का मानना है कि बार-बार चुनाव होने से प्रशासनिक और वित्तीय संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। यदि पूरे देश में एक साथ चुनाव कराए जाएं तो शासन और विकास कार्यों में निरंतरता बनी रह सकती है।
हालांकि इस व्यवस्था को लागू करने के लिए संविधान में कई संशोधन करने होंगे, जिसके लिए संसद में विशेष बहुमत आवश्यक है। यही वजह है कि भाजपा इस दिशा में राजनीतिक समर्थन बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
विपक्षी दलों में बढ़ी हलचल
हाल के महीनों में कई विपक्षी दलों में असंतोष और टूट की खबरें सामने आई हैं। इससे सत्तारूढ़ गठबंधन का मनोबल बढ़ा है, जबकि विपक्ष अपनी एकजुटता बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रहा है।
महाराष्ट्र में Uddhav Thackeray की पार्टी के कुछ सांसदों के बगावती रुख ने नई राजनीतिक चर्चा को जन्म दिया है। पार्टी में संभावित विभाजन की खबरों के बीच उद्धव ठाकरे ने भावुक अंदाज में कहा कि यदि पार्टी का उन पर भरोसा नहीं है तो वह पद छोड़ने को तैयार हैं, लेकिन पार्टी को गलत हाथों में नहीं जाने देंगे।
आने वाले महीनों में बदल सकता है राजनीतिक परिदृश्य
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी मानसून सत्र से पहले और उसके दौरान कई दलों में नए समीकरण बन सकते हैं। यदि दलबदल और राजनीतिक पुनर्संरेखण का सिलसिला जारी रहता है तो संसद का गणित तेजी से बदल सकता है।
ऐसे में परिसीमन, महिला आरक्षण और ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ जैसे मुद्दे केवल विधायी बहस तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि आने वाले वर्षों की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। संसद में संख्या बल की यह लड़ाई आने वाले समय में देश के राजनीतिक परिदृश्य को नया आकार दे सकती है।

