नई दिल्ली. राजाओं की धरती Rajasthan एक बार फिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए चर्चा में है। उदयपुर जिले का मेनार गांव इस साल भी 500 साल पुरानी ‘गनपाउडर होली’ मनाने की तैयारी में जुट गया है। यहां होली रंग-गुलाल से नहीं, बल्कि पटाखों, तोपों और बंदूकों की गर्जना के साथ खेली जाती है।
जीत की याद में शुरू हुई परंपरा
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा तब शुरू हुई जब गांव के वीरों ने मुगल सेना को हराकर विजय प्राप्त की थी। उसी जीत की स्मृति में हर साल ‘गनपाउडर होली’ मनाई जाती है।
इतिहासकारों के मुताबिक, जब Maharana Pratap ने मुगल सेना के खिलाफ हल्दीघाटी का युद्ध छेड़ा, तब मेवाड़ के लोगों में स्वाभिमान और वीरता की भावना जागृत हुई। बाद में उनके पुत्र अमर सिंह के नेतृत्व में आसपास के मुगल ठिकानों पर हमले हुए। बताया जाता है कि मेनार के पास भी एक मुगल चौकी थी, जिसे गांववालों ने परास्त किया।
जामरा बीज पर सजता है पूरा गांव
उदयपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित मेनार गांव ‘जामरा बीज’ के दिन पूरी तरह रोशनी से जगमगा उठता है। रंग-बिरंगी लाइटों से सजा गांव शाम ढलते ही उत्सव के रंग में डूब जाता है।
रात 9 बजे के बाद ग्रामीण पारंपरिक मेवाड़ी कसुमल साफा और पूर्व रियासती सैनिकों की वर्दी पहनकर ओमकारेश्वर चौक, चारभुजा मंदिर के सामने इकट्ठा होते हैं। इसके बाद बंदूकों की फायरिंग, तोपों की गर्जना और आतिशबाजी के बीच जश्न शुरू होता है।
दुनियाभर से पहुंचते हैं लोग
इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा के अनुसार, मेनारिया समुदाय के लोग वीरता के गीत गाते हुए इस परंपरा को निभाते हैं। दुबई, सिंगापुर, लंदन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में रहने वाले गांव के युवा भी इस अवसर पर अपने वतन लौट आते हैं।
ब्रिटिश इतिहासकार James Tod ने भी अपनी पुस्तक Annals and Antiquities of Rajasthan में मेनार (मनीहार) गांव का उल्लेख किया है, जिसे मेवाड़ के शासक उदय सिंह के दौर से जोड़ा गया है।
हर साल 15 मार्च को होने वाली यह अनोखी होली राजस्थान की समृद्ध विरासत और वीरता की परंपरा का जीवंत उदाहरण है।
