नई दिल्ली. मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लाया गया महाभियोग प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा में खारिज कर दिया गया है। इस फैसले के बाद अब ज्ञानेश कुमार अपने पद पर बने रहेंगे और उनके खिलाफ कोई कानूनी जांच या औपचारिक कार्रवाई नहीं होगी।
विपक्षी दलों ने उन्हें पद से हटाने की मांग करते हुए गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
193 सांसदों ने किया था प्रस्ताव पर हस्ताक्षर
CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए लाए गए इस प्रस्ताव पर कुल 193 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे। इनमें लोकसभा के 130 सांसद और राज्यसभा के 63 सांसद शामिल थे। विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर सात गंभीर आरोप लगाए थे। इनमें पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण, दुराचार, चुनावी धांधली और मतदान के अधिकार से वंचित करने जैसे आरोप शामिल थे। विपक्ष का कहना था कि इन आरोपों से यह स्पष्ट होता है कि चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्षता और तटस्थता बनाए रखने में विफलता हुई है।
संविधान और कानून के तहत हटाने की मांग
लोकसभा में दिया गया नोटिस भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5), अनुच्छेद 124(4), मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 11(2) और जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत दाखिल किया गया था।
इसी तरह का एक प्रस्ताव 12 मार्च को राज्यसभा सभापति और उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन को भी सौंपा गया था।
SIR प्रक्रिया को लेकर उठे थे सवाल
इस पूरे विवाद का एक बड़ा कारण मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया रही, जिसे खासकर बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में लागू किया गया था।
विपक्षी नेताओं का आरोप था कि इस प्रक्रिया के चलते कई वैध मतदाता मतदान अधिकार से वंचित हो गए। उनका यह भी कहना था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने कुछ राजनीतिक दलों के पक्ष में काम किया, जो पक्षपातपूर्ण निर्णय को दर्शाता है।
विपक्ष ने अपने आरोपों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला भी दिया और दावा किया कि SIR प्रक्रिया से केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचा।
उनका कहना था कि इससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हुई और लोकतांत्रिक अधिकारों को नुकसान पहुंचा।
लोकसभा और राज्यसभा—दोनों ने प्रस्ताव स्वीकार करने से किया इनकार
लोकसभा सचिवालय द्वारा जारी बुलेटिन में कहा गया कि स्पीकर ओम बिरला ने प्रस्ताव के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
बुलेटिन में कहा गया:
“नोटिस ऑफ मोशन और उससे जुड़े सभी तथ्यों व मुद्दों का सावधानीपूर्वक और निष्पक्ष आकलन करने के बाद, लोकसभा स्पीकर ने जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 की धारा 3 के तहत प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार किया है।”
इसी तरह, राज्यसभा सचिवालय ने भी एक आधिकारिक बुलेटिन जारी कर बताया कि सभापति सीपी राधाकृष्णन ने भी प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी।
राज्यसभा के बुलेटिन में कहा गया:
“नोटिस ऑफ मोशन और उससे जुड़े सभी प्रासंगिक पहलुओं व मुद्दों पर विचार करने के बाद, राज्यसभा सभापति ने जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 की धारा 3 के तहत प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार किया है।”
CEC को हटाने की प्रक्रिया क्या है?
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने जैसी होती है। CEC को केवल दो आधारों पर हटाया जा सकता है: सिद्ध कदाचार (Proven Misbehaviour) असमर्थता (Incapacity) इसके लिए संसद के किसी भी सदन में प्रस्ताव लाया जा सकता है, लेकिन उसे पारित करने के लिए विशेष बहुमत जरूरी होता है। यानी सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत, और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों में दो-तिहाई बहुमत जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटाया जा सकता।
क्या है इस फैसले का मतलब?
संसद के दोनों सदनों द्वारा महाभियोग प्रस्ताव खारिज किए जाने का सीधा मतलब यह है कि ज्ञानेश कुमार फिलहाल अपने पद पर बने रहेंगे और विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों पर कोई औपचारिक संसदीय जांच आगे नहीं बढ़ेगी। हालांकि, इस मुद्दे ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मतदाता सूची पुनरीक्षण, और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर एक नई राजनीतिक बहस जरूर छेड़ दी है।
