नई दिल्ली. भारत में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन अब इसकी रफ्तार पहले की तुलना में अधिक स्थिर होती दिख रही है। रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार FY2027 में देश की बिजली मांग में करीब 5 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है। कोरोना महामारी के बाद FY2022 और FY2023 में मांग में तेज उछाल देखने को मिला था, लेकिन अब वृद्धि सामान्य स्तर पर लौट रही है।
हालांकि मांग वृद्धि की रफ्तार कम होने के बावजूद चुनौती छोटी नहीं हुई है। मौजूदा उच्च आधार पर थोड़ी बढ़ोतरी भी बड़ी मात्रा में अतिरिक्त बिजली की जरूरत पैदा करती है। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ाने और विभिन्न ऊर्जा स्रोतों के बीच संतुलन बनाए रखने का दबाव लगातार बना हुआ है।
FY2027 में करीब 50 गीगावाट नई क्षमता जुड़ने की उम्मीद
भारत FY2027 में लगभग 50 गीगावाट नई बिजली उत्पादन क्षमता जोड़ सकता है। इसमें सबसे बड़ा योगदान रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर का रहने की संभावना है। सरकार की नीतिगत सहायता और कम होती लागत के कारण सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार तेजी से हो रहा है। लेकिन भारत की ऊर्जा रणनीति केवल हरित ऊर्जा तक सीमित नहीं है। देश थर्मल पावर सेक्टर में भी बड़े स्तर पर निवेश जारी रखे हुए है। वर्तमान में करीब 49 गीगावाट थर्मल क्षमता निर्माणाधीन है। इसमें बड़ी हिस्सेदारी केंद्र और राज्य सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की है। इससे साफ संकेत मिलता है कि थर्मल विस्तार केवल बाजार की मांग के आधार पर नहीं, बल्कि बिजली व्यवस्था की स्थिरता और बेसलोड सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है।
रिन्यूएबल के साथ थर्मल को भी समान महत्व
भारत अब ऊर्जा परिवर्तन के लिए एक संतुलित मॉडल अपना रहा है। देश पूरी तरह जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाने के बजाय ऐसी व्यवस्था तैयार कर रहा है, जिसमें रिन्यूएबल और थर्मल दोनों समानांतर रूप से काम करें। रिन्यूएबल ऊर्जा की सबसे बड़ी चुनौती उसकी अनियमितता है, क्योंकि सौर और पवन उत्पादन मौसम पर निर्भर रहता है। ऐसे में लगातार बिजली आपूर्ति बनाए रखने के लिए थर्मल पावर अभी भी जरूरी माना जा रहा है। यही कारण है कि सरकार दोनों सेक्टरों में एक साथ निवेश कर रही है।
कोयले पर निर्भरता अब भी बरकरार
थर्मल बिजली उत्पादन के लिए कोयला आज भी भारत की ऊर्जा व्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है। हालांकि घरेलू कोयला आधारित संयंत्रों में ईंधन भंडार पिछले साल की तुलना में थोड़ा कम बताया गया है, जिससे पीक डिमांड के दौरान दबाव बढ़ सकता है।
FY2027 में थर्मल यूटिलिटीज की कुल कोयला खपत में लगभग 6 प्रतिशत हिस्सा आयातित कोयले का रहने का अनुमान है। इससे स्पष्ट है कि घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत अभी भी कुछ हद तक विदेशी आपूर्ति पर निर्भर रहेगा।
बाजार संकेतों में दिख रही सतर्कता
ऊर्जा क्षेत्र में विस्तार के बावजूद बाजार से मिले संकेत मिश्रित हैं। कोयला आधारित बिजली के मीडियम-टर्म टैरिफ हाल के उच्च स्तर से नीचे आए हैं। वहीं वितरण कंपनियों यानी डिस्कॉम्स द्वारा नई क्षमता की बुकिंग में भी तेज गिरावट दर्ज की गई है।
यह दर्शाता है कि एक ओर उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ाई जा रही है, जबकि दूसरी ओर बिजली खरीद को लेकर वितरण कंपनियां सतर्क रुख अपना रही हैं। मांग के भविष्य को लेकर अनिश्चितता और वित्तीय दबाव इसकी बड़ी वजह माने जा रहे हैं।
विश्वसनीय बिजली आपूर्ति पर फोकस
इन सभी संकेतों से साफ है कि भारत की ऊर्जा नीति अब केवल हरित बदलाव तक सीमित नहीं है। सरकार एक ऐसी बहुस्तरीय रणनीति पर काम कर रही है, जिसमें रिन्यूएबल विस्तार, थर्मल निवेश और कोयला आपूर्ति प्रबंधन तीनों को साथ लेकर चला जा रहा है। भारत का लक्ष्य सिर्फ स्वच्छ ऊर्जा बढ़ाना नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में भरोसेमंद और स्थिर बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना भी है।
