नई दिल्ली. देश में सड़क सुरक्षा को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या बढ़कर 1,77,175 हो गई, जो 2023 के मुकाबले 2.5 प्रतिशत अधिक है। वहीं कुल सड़क दुर्घटनाओं की संख्या भी बढ़कर 4,87,707 पहुंच गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.5 प्रतिशत ज्यादा है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में औसतन हर दिन 485 लोगों की सड़क हादसों में मौत हुई, जबकि हर घंटे करीब 20 लोगों ने अपनी जान गंवाई। यह आंकड़ा दर्शाता है कि देश में सड़क सुरक्षा को लेकर किए जा रहे प्रयास अभी भी पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं।
दस वर्षों के औसत से कहीं ज्यादा मौतें
मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2023 के बीच सड़क दुर्घटनाओं में सालाना औसत मौतों का आंकड़ा करीब 1.54 लाख था। इसके मुकाबले 2024 में मौतों की संख्या काफी अधिक रही। हालांकि प्रति 10 हजार वाहनों पर मृत्यु दर में गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन तेजी से बढ़ती वाहन संख्या और सड़क नेटवर्क के विस्तार के कारण कुल मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है।
दिल्ली सबसे खतरनाक महानगरों में शीर्ष पर
देश के बड़े शहरों में दिल्ली सड़क हादसों और मौतों दोनों मामलों में सबसे ऊपर रही। राष्ट्रीय राजधानी में 2024 के दौरान 5,657 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1,551 लोगों की मौत हो गई और 5,224 लोग घायल हुए। पैदल यात्रियों की मौतों के मामले में भी दिल्ली चिंताजनक स्थिति में रही, जहां सड़क पार करते समय 147 लोगों ने जान गंवाई।
बेंगलुरु दुर्घटनाओं और मौतों के मामले में दूसरे स्थान पर रहा। यहां 4,769 हादसों में 894 लोगों की मौत हुई। चेन्नई में 3,762 दुर्घटनाएं और 542 मौतें दर्ज की गईं, जबकि मुंबई में 2,604 दुर्घटनाओं में 370 लोगों की जान गई। कोलकाता में इन महानगरों के मुकाबले सबसे कम मौतें दर्ज की गईं।
हिट एंड रन मामलों में सबसे तेज वृद्धि
रिपोर्ट के अनुसार, हिट एंड रन मामलों में मौतों की संख्या सबसे तेजी से बढ़ी है। 2024 में ऐसे हादसों में 34,030 लोगों की मौत हुई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 9 प्रतिशत अधिक है। कुल सड़क दुर्घटना मौतों में इनकी हिस्सेदारी 19.2 प्रतिशत रही।
वहीं पीछे से टक्कर (रियर-एंड कोलिजन) सड़क हादसों में मौत का सबसे बड़ा कारण बनी रही। इस तरह की दुर्घटनाओं में 37,404 लोगों की जान गई, जो कुल मौतों का 21.1 प्रतिशत है। आमने-सामने की टक्कर में 28,400 लोगों की मौत हुई, हालांकि इस श्रेणी में मामूली गिरावट दर्ज की गई।
ओवरस्पीडिंग बनी सबसे बड़ा कारण
रिपोर्ट में सड़क दुर्घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण ओवरस्पीडिंग को बताया गया है। वर्ष 2024 में सड़क हादसों में हुई कुल मौतों में 70.3 प्रतिशत मामलों में तेज रफ्तार जिम्मेदार रही।
विशेषज्ञों का कहना है कि सीधे और लंबे सड़क मार्गों पर चालक अक्सर निर्धारित सीमा से अधिक गति से वाहन चलाते हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। आंकड़ों के मुताबिक, सीधी सड़कों पर 1,18,817 लोगों की मौत हुई, जो कुल मौतों का 67 प्रतिशत से अधिक है।
दोपहिया सवार और पैदल यात्री सबसे ज्यादा शिकार
सड़क दुर्घटनाओं में सबसे ज्यादा प्रभावित दोपहिया वाहन चालक और सवार रहे। कुल मौतों में 46.2 प्रतिशत हिस्सेदारी दोपहिया वाहनों की रही। इसके बाद पैदल यात्रियों की हिस्सेदारी 20.6 प्रतिशत रही।
राष्ट्रीय राजमार्ग देश के कुल सड़क नेटवर्क का केवल 2.1 प्रतिशत हिस्सा हैं, लेकिन सड़क हादसों में होने वाली कुल मौतों में इनकी हिस्सेदारी 36.6 प्रतिशत रही। यह दर्शाता है कि हाईवे पर दुर्घटनाएं अधिक घातक साबित हो रही हैं।
युवाओं पर सबसे ज्यादा असर
रिपोर्ट में सामने आया कि 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग के लोग सड़क हादसों में सबसे ज्यादा जान गंवा रहे हैं। इस आयु वर्ग की हिस्सेदारी कुल मौतों में 66.1 प्रतिशत रही। यदि 18 से 60 वर्ष के कामकाजी वर्ग को शामिल किया जाए तो यह आंकड़ा बढ़कर 83.3 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है। कुल सड़क दुर्घटना मौतों में 70.8 प्रतिशत मामले ग्रामीण इलाकों से जुड़े रहे, जिससे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच सड़क सुरक्षा के अंतर को उजागर किया गया है।
तमिलनाडु में सबसे ज्यादा हादसे, उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक मौतें
राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु में सबसे ज्यादा 67,526 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जो देश के कुल हादसों का 13.8 प्रतिशत है। वहीं उत्तर प्रदेश सड़क दुर्घटना मौतों के मामले में सबसे ऊपर रहा, जहां 24,118 लोगों ने अपनी जान गंवाई।
मिजोरम में दुर्घटनाओं की गंभीरता सबसे अधिक रही, जहां प्रत्येक 100 दुर्घटनाओं पर 93.2 मौतें दर्ज की गईं। इसके बाद बिहार और झारखंड का स्थान रहा।
हेलमेट और सीट बेल्ट को लेकर दिखा मामूली सुधार
रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं। हेलमेट न पहनने के कारण होने वाली मौतों में मामूली कमी आई है। 2023 में जहां ऐसे मामलों में 54,568 लोगों की मौत हुई थी, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर 54,122 रह गई।
सीट बेल्ट न लगाने से होने वाली मौतों में अपेक्षाकृत बड़ी गिरावट दर्ज की गई। 2023 में इस कारण 16,025 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 2024 में यह आंकड़ा घटकर 14,466 रह गया।
केवल आंकड़े नहीं, समाधान की जरूरत
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल दुर्घटनाओं और मौतों के आंकड़े जुटाना पर्याप्त नहीं है। दुर्घटनाओं के वास्तविक कारणों की वैज्ञानिक जांच और उनके आधार पर नीतिगत सुधार जरूरी हैं। उनका कहना है कि जब तक सड़क हादसों के मूल कारणों की पहचान कर ठोस कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक मौतों का यह सिलसिला थमना मुश्किल होगा।
2024 की रिपोर्ट एक बार फिर चेतावनी देती है कि भारत में सड़क सुरक्षा अब केवल यातायात का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय विकास का भी बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

