नई दिल्ली. केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने 10वीं के छात्रों के लिए तीसरी भाषा को लेकर बड़ा फैसला लिया है। बोर्ड ने साफ किया है कि शैक्षणिक सत्र 2027-28 से 10वीं में पढ़ने वाले छात्रों को तीसरी भाषा में स्कूल द्वारा होने वाले मूल्यांकन में पास होना अनिवार्य होगा। अगर छात्र इसमें सफल नहीं होते हैं, तो उन्हें 10वीं का पास प्रमाणपत्र नहीं दिया जाएगा।
हालांकि, बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि तीसरी भाषा की परीक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा का हिस्सा नहीं होगी। इसकी जांच और मूल्यांकन स्कूल स्तर पर ही किया जाएगा।
स्कूल में पास होना जरूरी
सीबीएसई ने 10 जुलाई को जारी निर्देश में कहा है कि हर छात्र को तीसरी भाषा के स्कूल मूल्यांकन में पास होना होगा। यदि कोई छात्र इसमें असफल होता है, तो स्कूल उसे दोबारा परीक्षा का मौका देगा। बोर्ड का अंतिम परिणाम जारी होने से पहले छात्र को इस मूल्यांकन में सफल होना जरूरी होगा।
9वीं में फेल होने पर नहीं रुकेगी पढ़ाई
बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई छात्र 9वीं कक्षा में तीसरी भाषा की स्कूल परीक्षा में पास नहीं हो पाता है, तो उसे रोका नहीं जाएगा। उसे 10वीं में प्रवेश मिल जाएगा, लेकिन 10वीं की पढ़ाई के दौरान 9वीं की तीसरी भाषा की परीक्षा भी पास करनी होगी।
नई शिक्षा नीति के तहत लागू होगा नियम
यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत लागू किए जा रहे तीन-भाषा फार्मूले का हिस्सा है। इसके अनुसार, छठी कक्षा से छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें से दो भारतीय भाषाएं होना जरूरी है।
जो छात्र पहले से अंग्रेजी के साथ किसी विदेशी भाषा का चयन कर चुके हैं, वे उसे पढ़ाई जारी रख सकते हैं। लेकिन इसके साथ उन्हें एक अतिरिक्त भारतीय भाषा भी पढ़नी होगी।
अब 9वीं और 10वीं में भी पढ़नी होगी तीसरी भाषा
पहले छात्र आठवीं कक्षा के बाद तीसरी भाषा पढ़ना बंद कर देते थे। लेकिन अब नए नियमों के तहत 2026-27 से 9वीं और 2027-28 से 10वीं में भी तीसरी भाषा पढ़ना अनिवार्य होगा। हालांकि, यह नियम 2026-27 में 10वीं की परीक्षा देने वाले मौजूदा छात्रों पर लागू नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा मामला
तीन-भाषा नीति को लेकर कुछ अभिभावकों और विदेशी भाषा के शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि नई व्यवस्था से छात्रों और स्कूलों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने जवाब में सीबीएसई ने बताया कि उसके करीब 47 प्रतिशत संबद्ध स्कूल पहले से ही 9वीं कक्षा में दो या उससे अधिक भारतीय भाषाएं पढ़ा रहे हैं। बोर्ड ने यह भी कहा कि 99 प्रतिशत से अधिक स्कूलों में कम से कम एक भारतीय भाषा का शिक्षक मौजूद है।
जरूरत पड़ने पर मिलेगी छूट
सीबीएसई ने माना है कि कुछ स्कूलों में सभी भारतीय भाषाओं के शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए शुरुआती दौर में स्कूलों को आवश्यकतानुसार लचीली व्यवस्था अपनाने की अनुमति दी जाएगी, ताकि नई नीति को आसानी से लागू किया जा सके।
अब इस मामले की अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी, जहां तीन-भाषा नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार किया जाएगा।
