नई दिल्ली: देश की राजनीति में बड़ा बदलाव लाने वाली महिला आरक्षण व्यवस्था को लागू करने के लिए केंद्र सरकार ने तैयारी तेज कर दी है। सरकार मौजूदा संसद सत्र में कम से कम दो अहम विधेयक लाने पर विचार कर रही है, जिनमें संवैधानिक संशोधन भी शामिल हो सकते हैं। मकसद यह है कि अगली लोकसभा और उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण दिया जा सके।
लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 816 तक किया जा सकता है
योजना के तहत लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 816 तक किया जा सकता है। यानी कुल 273 नई सीटें जोड़ी जाएंगी और इन्हें महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाएगा। इस फार्मूले का उद्देश्य यह भी है कि मौजूदा सांसदों की सीटों पर सीधा असर न पड़े और नई व्यवस्था लागू होने के बावजूद वर्तमान राजनीतिक संतुलन पूरी तरह न बदले।
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा भी बढ़कर 409 हो जाएगा। यह पिछले पांच दशकों में पहली बार होगा जब लोकसभा की कुल सदस्य संख्या में इतनी बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। हालांकि राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों की सीटों पर इसका असर नहीं पड़ेगा।
सरकार दूसरे दलों का समर्थन जुटाने में लगी
सरकार जिन दो विधेयकों पर काम कर रही है, उनमें एक परिसीमन से जुड़ा हो सकता है, जबकि दूसरा संविधान संशोधन का होगा। संविधान संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। चूंकि NDA के पास अपने दम पर इतना आंकड़ा नहीं है, इसलिए सरकार दूसरे दलों का समर्थन जुटाने में लगी है।
इस दिशा में गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को दो अलग-अलग बैठकों में कई दलों से चर्चा की। एक बैठक NDA सहयोगियों के साथ हुई, जबकि दूसरी में गैर-NDA क्षेत्रीय दलों, विपक्षी पार्टियों और किसी भी खेमे से बाहर माने जाने वाले दलों के प्रतिनिधि शामिल हुए। माना जा रहा है कि सरकार बजट सत्र के भीतर ही इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाना चाहती है। जरूरत पड़ने पर महिला आरक्षण के मुद्दे पर अलग से छोटा सत्र बुलाने का ऑप्शन भी खुला रखा गया है।
लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू
सरकार की कोशिश है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू हो जाए। इसके लिए 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को आगामी जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ने की बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर नया परिसीमन कराने का विचार सामने आया है। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि नई जनगणना के आंकड़े आने और फिर उसके आधार पर देशभर में परिसीमन पूरा करने में काफी समय लग सकता है।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार चाहती है कि 31 मार्च 2029 के बाद होने वाले चुनावों से यह व्यवस्था लागू हो। अगर सर्वसम्मति बनाने में कुछ और समय लगता है तो मौजूदा सत्र बढ़ाया भी जा सकता है या फिर कुछ दिनों के अंतराल के बाद संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है।
प्रस्तावित परिसीमन में राज्यों की लोकसभा सीटों में लगभग 50 प्रतिशत बढ़ोतरी की बात कही जा रही है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 और बिहार की सीटें 40 से बढ़कर 60 हो सकती हैं। वहीं केरल की सीटें 20 से बढ़कर 30 तक पहुंच सकती हैं। जिन राज्यों में सीटों की संख्या विषम है, वहां परिसीमन आयोग समान अनुपात में व्यवस्था तय करेगा।
हर तीसरे चुनाव में सीट महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती है
सरकार का मानना है कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की लोकसभा में हिस्सेदारी को समान अनुपात में 50 प्रतिशत बढ़ाने से दक्षिणी राज्यों की चिंता कम होगी। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों को आशंका रही है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन के कारण भविष्य में संसद में उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है। नई योजना इस आशंका को संतुलित करने की कोशिश मानी जा रही है।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या में भी इसी अनुपात में बढ़ोतरी का अनुमान है। लोकसभा में SC के लिए आरक्षित 84 सीटें बढ़कर 126 और ST के लिए आरक्षित 47 सीटें बढ़कर 70 हो सकती हैं। छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, जहां एक या दो लोकसभा सीटें हैं, वहां हर तीसरे चुनाव में सीट महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती है। महिला आरक्षित सीटें तीन कार्यकाल तक आरक्षित रहने के बाद फिर सामान्य श्रेणी में लौट सकती हैं।
महिला आरक्षण के इस मसले पर राजनीतिक सहमति बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। NDA की बैठक में 22 सांसदों ने हिस्सा लिया, जबकि दूसरी बैठक में समाजवादी पार्टी, शिवसेना (UBT), बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस जैसे दलों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। दूसरी तरफ कांग्रेस, वाम दल और कुछ अन्य विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक की मांग कर रही हैं। तृणमूल कांग्रेस ने बैठक से दूरी बनाए रखी।
सरकार ने “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” नाम दिया
कुछ विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी, महिला आरक्षण के भीतर OBC आरक्षण की मांग भी उठा रहे हैं। ऐसे में सरकार के लिए केवल विधायी गणित ही नहीं, बल्कि राजनीतिक सहमति का समीकरण भी अहम हो गया है।
सितंबर 2023 में संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक पारित किया गया था, जिसे सरकार ने “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” नाम दिया था। हालांकि उस समय विपक्षी सांसदों और महिला अधिकार समूहों ने इसकी आलोचना की थी, क्योंकि कानून के लागू होने को नई जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया था। इससे 2029 तक इसके अमल को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी।
अब सरकार उस अनिश्चितता को खत्म कर महिला आरक्षण को तय समयसीमा में लागू करने के लिए नया रास्ता तलाश रही है। अगर यह योजना सफल होती है तो देश की चुनावी और संसदीय राजनीति में यह एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।
