नई दिल्ली: उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों पर केंद्र सरकार एक बार फिर विचार करेगी। केंद्र ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इन नियमों की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने की योजना है। सरकार ने कहा कि समिति नियमों से जुड़ी चिंताओं की जांच करेगी और सभी वर्गों के छात्रों के हितों का ध्यान रखा जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने UGC के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की। इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि किसी भी समुदाय के छात्र को डर, असंतोष या भेदभाव महसूस नहीं होना चाहिए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इन नियमों के लागू होने पर रोक लगा चुका है।
नियमों को लेकर क्यों उठे सवाल?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नए नियम भेदभावपूर्ण हैं और इनमें सामान्य वर्ग के छात्रों को समान सुरक्षा नहीं दी गई है। उनका तर्क है कि नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा इस तरह तय की गई है, जिससे भेदभाव की शिकायतों को लेकर असमानता पैदा हो सकती है।
सुनवाई के दौरान वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि नियमों में यह नहीं मानना चाहिए कि जातिगत भेदभाव केवल किसी एक वर्ग के खिलाफ ही हो सकता है। उन्होंने इस परिभाषा पर रोक लगाने की मांग की।
सीजेआई ने उठाए कई सवाल
सीजेआई सूर्यकांत ने उदाहरण देते हुए पूछा कि अगर दक्षिण भारत का कोई छात्र उत्तर भारत के विश्वविद्यालय में दाखिला लेता है या उत्तर भारत का छात्र दक्षिण भारत में पढ़ने जाता है और उसे वहां अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है, तो ऐसे मामलों में नियम कैसे लागू होंगे?
इस पर वकील ने कहा कि UGC के नियमों की धारा 3(e) में ऐसे मामलों को शामिल किया गया है। सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि नई परिभाषा में रैगिंग का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं किया गया है।
सीजेआई ने कहा कि विश्वविद्यालयों में अलग-अलग क्षेत्रों और संस्कृतियों से आने वाले छात्र पढ़ते हैं। कई बार एक-दूसरे की परंपराओं को न समझने के कारण ऐसी टिप्पणियां हो सकती हैं, जो किसी छात्र को आहत करें। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या देश जातिविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ने के बजाय फिर से पीछे जा रहा है?
अलग-अलग हॉस्टल बनाने के सुझाव पर भी चिंता
सुनवाई के दौरान जाति के आधार पर अलग-अलग हॉस्टल बनाने के सुझाव पर भी सीजेआई ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि समाज में अंतरजातीय विवाह भी होते हैं और विश्वविद्यालयों के हॉस्टल में सभी समुदायों के छात्र साथ रहते आए हैं। अदालत ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में किसी भी तरह का अलगाव नहीं होना चाहिए।
2012 के नियमों का मामला भी उठा
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने 2012 के UGC नियमों को चुनौती देने वाली याचिका का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि यह मामला 2019 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और अब नए नियम लाए जा रहे हैं। इस पर सीजेआई ने कहा कि अदालत फिलहाल 2012 के नियमों के मामले में पीछे नहीं जाना चाहती।
केंद्र की ओर से समिति बनाने की बात ऐसे समय कही गई है, जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही नए UGC नियमों पर रोक लगा चुका है। अब समिति की समीक्षा और आगे की सुनवाई के बाद इन नियमों को लेकर अगला कदम स्पष्ट होगा।

