दूरियों को मिटाता रेडियो

नई दिल्ली. आज विश्‍व रेडियो दिवस है, ऐसे में हम चलते हैं रेडियो की यात्रा पर. कभी हम नदी की कलकल करती ध्वनि में खो जाते हैं तो कभी पहाड़ों की घाटियों में चले जाते हैं. खुली आंखों के साथ हम उन जगहों की भी कल्पना कर लेते हैं जहां पर हम कभी गए नहीं होते हैं. यह रेडियो ही है जो सरहदों के पार भी हमे बिना वीजा-पासपोर्ट के सैर करा देता है. दुर्गम भौगोलिक विभाजनों की सीमा से परे यह हमारी ज़िन्‍दगियों को छूता है और इसके बावजूद भी परदे के पीछे बना रहता है. एक ऐसे अच्‍छे मित्र की तरह जो बुरे दिनों में सहायता के लिए हमेशा तत्‍पर रहता है लेकिन उसके बदले में कुछ नहीं चाहता है.

प्राकृतिक आपदाओं के आने पर जब सभी नए माध्‍यम असफल हो जाते हैं तो ऐसे में एकमात्र रेडियो ही है जो लोगों को आपस में जोड़ता है. सभी की जिंदगी में रेडियो की अहमियत को देखते हुए यूनेस्‍को ने वर्ष 2011 में 13 फरवरी को विश्‍व रेडियो दिवस के रूप में घोषित किया. जिसके बाद हर साल इस दिन को विश्‍व रेडियो दिवस के रूप में मनाया जाता है.

हमें एक दूसरे के नजदीक लाता रेडियो :

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने विश्‍व रेडियो दिवस के अवसर पर रेडियो से जुड़े लोगों और श्रोताओं सहित रेडियो जगत के सभी लोगों को बधाई दी है. प्रधानमंत्री ने कहा, ‘’ विश्‍व रेडियो दिवस पर मैं रेडियो जगत से जुड़े उन सभी लोगों को बधाई देता हूं, जिनमें इस उद्योग में कार्यरत लोग और श्रोतागण शामिल हैं. मैं कामना करता हूं कि यह माध्‍यम हमेशा सीखने, खोज करने, मनोरंजन और एक साथ आगे बढ़ने का केंद्र बना रहे. ‘’

उन्होंने कहा कि रेडियो हमें एक दूसरे के नजदीक लाता है और मन की बात कार्यक्रम के जरिए लगातार मैंने यह अनुभव किया है. यूनेस्‍को वेबसाइट से उद्धरण के अनुसार, ‘’अपने श्रोताओं को सुनते हुए और उनकी जरूरतों पर प्रतिक्रिया देने के लिए, रेडियो हम सबके सामने आने वाली चुनौतियों के आवश्‍यक समाधान की दिशा में विचारों और आवाज़ों की विविधता प्रदान करता है. ‘’

रेडियो भारत में 1.25 अरब की आबादी के साथ जातीय-सामाजिक-भाषाई विविधता, साक्षरता स्‍तर, आर्थिक असमानता, लिंग असमानता, संसाधनों के वितरण में असमानता, ग्रामीण-शहरी अंतर और डिजिटल अंतर जैसी सर्वाधिक असंभव चुनौतियों का सामना करते हुए आपस में जोड़ता है. एक लोक सेवा रेडियो प्रसारक के रूप में, ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) ने भारतीय समाज के विकास, वैज्ञानिक विकास, महिलाओं के सशक्तीकरण, वंचितों को लाभ, कृषि नवाचार का प्रचार और ग्रामीण उत्‍थान में अपनी बड़ी भूमिका अदा किया और आज भी कर रहा है.

जिंदगी का गुमनाम नायक है रेडियो :

रेडिया की यही सारी विशेषताओं को देखते हुए प्रख्‍यात कृषि वैज्ञानिक और हरित क्रांति के जनक एम.एस. स्‍वामीनाथन ने रेडियो के विकास की पहल की सराहना इन शब्‍दों में की है. ‘ यहां तक की वे लोग जिन्‍हें प्रौद्योगिकीय परिवर्तन से बाहर रखा गया उन्‍हें इसमें इसलिए शामिल किया जा सका क्‍योंकि उन्‍होंने रेडियो के माध्‍यम से नई प्रौद्योगिकियों के बारे में सुना. वास्‍तव में मुझे 1967-68 की बात याद है जब उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत से किसानों ने चावल, गेंहू और अन्‍य फसलों की नई किस्‍मों का शुभारंभ किया जिसके बारे में उन्‍होंने रेडियो पर सुना था. यही कारण है कि मैं ऑल इंडिया रेडियो को हरित क्रांति के गुमनाम नायकों में से एक के तौर पर अपना सम्‍मान देना चाहूंगा.’

रेडियो कल्‍पना का संसार है. रेडियो नेत्रहीनों के लिए थियेटर है. रेडियो अंतरंग कथा वाचन का एक माध्‍यम है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री का नागरिकों से अपने मन की बात कहने के लिए अन्‍य माध्‍यमों की अपेक्षा आकाशवाणी को चुना जाना एक आश्‍चर्य से कम नहीं है.

भारत में रेडियो :

भारत में रेडियो प्रसारण की पहली शुरुआत जून 1923 रेडियो क्लब मुंबई द्वारा हुई थी लेकिन इंडियन ब्रॉडकास्ट कंपनी के तहत देश के पहले रेडियो स्टेशन के रूप में बॉम्बे स्टेशन तब अस्तित्व में आया जब 23 जुलाई 1927 को वाइसराय लार्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया, लेकिन 8 जून 1936 को इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस को ‘ऑल इंडिया रेडियो’ का नाम दे दिया गया जिस नाम से यह आज तक प्रचलित है.

सन 1947 में देश के विभाजन के समय भारत में कुल 9 रेडियो स्टेशन थे, जिनमें पेशावर, लाहौर और ढाका तीन पाकिस्तान में चले गए, भारत में दिल्ली, बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, तिरुचिरापल्ली और लखनऊ के 6 केंद्र रह गए, लेकिन आज देश में रेडियो के कुल 420 प्रसारण केंद्र हैं और आज देश की 99.20 प्रतिशत जनसंख्या तक आल इंडिया रेडियो का प्रसारण पहुंच रहा है, जो इस बात का प्रमाण है कि इन पिछले करीब 70 बरसों में रेडियो का विकास कितनी तीव्र गति से हुआ है.

फिर लौट आया रेडियो का समय 

सन 1990 के बाद जब देश में दूरदर्शन के साथ कई समाचार और मनोरंजन चैनल्स ने अपने पांव ज़माने तेज कर लिए तो रेडियो की लोकप्रियता धीरे धीरे कम होने लगी, तभी लगा कि यही हाल रहा तो रेडियो को लोग भूल ही जाएंगे. यह रेडियो के लिए निश्चय ही बड़ी चुनौती का समय था. एक ऐसी चुनौती, जहां करो या मरो जैसी परिस्थितियां बन गयीं थीं. लेकिन समय के साथ कदम ताल मिलाते हुए रेडियो ने जहां अपने कार्यक्रमों में कई व्यापक बदलाव किए वहां देश में कई निजी एफएम चैनल्स के साथ ऑल इंडिया रेडियो के अपने एफ एम गोल्ड और रेनबो जैसे आधुनिक चैनल्स भी शुरू कर दिए गए. इन एफएम चैनल्स को जहां युवा पीढ़ी ने बहुत पसंद किया वहीं पुरानी पीढ़ी के लिए भी इन चैनल्स में उनके पसंद और महत्‍व के कई प्रसारण रखे गए.

‘मन की बात’ कार्यक्रम के बाद तो रेडियो की लोकप्रियता में बढ़ोतरी 

ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली केंद्र में उपमहानिदेशक राजीव कुमार शुक्ल बताते हैं, “ रेडियो की उपयोगिता और इसका महत्व आज भी बरकरार है. प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ कार्यक्रम के बाद तो रेडियो की लोकप्रियता में एक साथ काफी बढ़ोतरी हुई है. रेडियो का आज भी कोई मुकाबला नहीं है, क्योंकि हमारे यहां रेडियो पर देश के हर क्षेत्र, हर वर्ग और हर भाषा के कार्यक्रम प्रसारण होते हैं. आल इंडिया रेडियो के प्रसारण देश के 92 प्रतिशत क्षेत्र तक पहुँच रहे हैं. फिर हम विभिन्न किस्म के कार्यक्रम प्रसारित करते हैं जिससे सूचना, शिक्षा और मनोरंजन सभी कुछ है् बच्चे हों, या युवा और महिलाएं, दंपत्ति हों या बुजुर्ग सभी के लिए रेडियो पर इतना कुछ है कि श्रोताओं को और कहीं जाने की जरुरत ही नहीं.

आकाशवाणी देशभर में फैले अपने 422 स्‍टेशनों के साथ, यकीनन दुनिया के सबसे बड़े रेडियो नेटवर्कों में से एक है, जो आबादी के विभिन्‍न हिस्‍सों की सेवा करता है. रेडियो अनवरत चलने वाला एक गीत है, जो समय के साथ अपनी ताल बदलता है। वह 21वीं सदी के परिवर्तनों के अनुरूप अपने को ढाल कर परस्‍पर संवाद और भागीदारी के नए तरीकों को पेश कर रहा है और ज्‍यादा-से-ज्‍यादा परस्‍पर संवादी बन रहा है.

यूनेस्‍को का उद्धरण एक बार पुन: देते हुए, ‘ जहां सोशल मीडिया श्रोताओं में बिखराव का कार्य कर रहा हैं, ऐसे में रेडियो समुदायों को एकसूत्र में पिरोने और बदलाव के लिए सकारात्मक चर्चा को आगे बढ़ाने की दिशा में विशिष्‍ट रूप से काम कर रहा है.’

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