नई दिल्ली. हिमाचल प्रदेश में आगामी पंचायत चुनावों से पहले राज्य सरकार को बड़ा झटका लगा है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने डिप्टी कमिश्नरों (DCs) को पंचायत चुनावों में 5% तक सीटों के आरक्षण रोस्टर में बदलाव करने की दी गई विवेकाधीन शक्तियों पर रोक लगा दी है। अदालत ने साफ किया है कि नए नियमों के तहत तैयार किया गया कोई भी आरक्षण रोस्टर दोबारा बनाना होगा।
यह फैसला हाईकोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान आया। कोर्ट ने एक बार फिर सभी जिलों के डिप्टी कमिश्नरों को निर्देश दिया कि पंचायत चुनावों के लिए आरक्षण रोस्टर 7 अप्रैल तक हर हाल में अंतिम रूप देकर लागू किया जाए। फिलहाल कोर्ट के विस्तृत आदेश का इंतजार किया जा रहा है।
सरकार के फैसले को हाईकोर्ट ने माना मनमाना
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता नंद लाल ने कहा कि राज्य सरकार के पास ऐसा संशोधन लाने का अधिकार नहीं था। उनके मुताबिक, यह फैसला पूरी तरह मनमाना और कानून के दायरे से बाहर था।
उन्होंने कहा,
“राज्य सरकार के पास यह संशोधन लाने की शक्ति नहीं थी। यह सरकार का मनमाना कदम था। हाईकोर्ट ने न केवल इस पर रोक लगाई है, बल्कि यह भी निर्देश दिया है कि कानून के अनुसार ही सभी रोस्टर लागू किए जाएं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि पंचायत चुनाव 31 मई तक कराए जाएं।”
5 जिलों में जारी हो चुके रोस्टर पर भी असर
हाईकोर्ट के आदेश से पहले राज्य के पांच जिलों—कुल्लू, शिमला, मंडी, कांगड़ा और हमीरपुर—में पंचायत चुनावों के लिए आरक्षण रोस्टर जारी कर दिए गए थे।
अब हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद इन जिलों में जारी रोस्टर पर भी असर पड़ सकता है। यदि किसी जिले के DC ने नए नियमों के तहत 5% सीटों पर अपने विवेकाधीन अधिकार का इस्तेमाल करते हुए आरक्षण तय किया है, तो ऐसे मामलों में पूरा रोस्टर फिर से तैयार करना पड़ेगा।
31 मई तक पंचायत चुनाव कराने की भी स्पष्टता
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी साफ कर दिया कि पंचायत चुनावों की प्रक्रिया में देरी नहीं होनी चाहिए और 31 मई तक चुनाव कराए जाने चाहिए। ऐसे में अब राज्य सरकार और जिला प्रशासन के सामने कानूनी मानकों के अनुसार नया रोस्टर तैयार करने और चुनावी प्रक्रिया समय पर पूरी करने की चुनौती होगी।
क्या है पूरा मामला?
राज्य सरकार ने हाल ही में एक ऐसा प्रावधान लागू किया था, जिसके तहत डिप्टी कमिश्नरों को पंचायत चुनावों में 5% तक सीटों के आरक्षण रोस्टर में बदलाव करने की छूट दी गई थी। इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई थी।
याचिका में कहा गया कि यह संशोधन कानूनी प्रावधानों के विपरीत है और इससे आरक्षण प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। अब हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगाते हुए साफ कर दिया है कि आरक्षण रोस्टर तय करने की प्रक्रिया कानून के मुताबिक ही चलेगी।
