कर्मों के प्रायश्चित के लिए अनशन पर बैठे शिवराज सिंह !

नई दिल्ली. मध्यप्रदेश की सियासत में तीसरी पारी के आखिरी दौर में अपनों से घिर चुके मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को अततः सड़क पर आना पड़ गया. मंदसौर में हिंसक किसान आन्दोलन में गोलीबारी के बाद मारे गए छह लोगों के परिवार को सांत्वना देने के लिए वे भोपाल के दशहरा मैदान में अनशन पर बैठ गए. राजनीतिक इतिहास में इसे किसी मुख्यमंत्री की बड़ी नाकामी के तौर पर दर्ज किया जाएगा. इधर किसान प्रदेशभर में जेल भरो आन्दोलन कि तैयारी में जुटे हैं.

इस आन्दोलन को उत्पातियों की कारगुजारी करार देकर कांग्रेस पर थोपकर वे खुले मैदान में आ गए हैं कि जिसे बात करनी है यहाँ आ जाए. साफ तौर पर ज़ाहिर है सरकार इस कदर नाकाम हो चुकी है कि मुख्यमंत्री मंदसौर में आन्दोलनकारियों के बीच नहीं जा पा रहे हैं. अगर किसान बात करने वहां नहीं जाते तो सन्देश चला जाएगा कि किसान बात नहीं करना चाहते. सरकार मामले से बच निकलेगी. शिवराज सरकार पर भ्रष्टाचार के भी गहरे आरोप हैं. तथ्य तो ये भी हैं कि सरकार नर्मदा यात्रा में इस कदर मशगूल हो गई कि शासन पर नियन्त्रण ही नहीं रहा. ऐन वक़्त पर भाजपाई भी शिवराज सिंह का साथ छोड़ चुके हैं.

इधर कांग्रेस मौके को पूरा भुनाने में जुटी है. शायद यही वजह रही कि कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने खुद किसानों के बीच जाकर खुद को किसानों को हितैषी जताने की कोशिश की. ऐसे में शिवराज सिंह अनशन पर बैठकर अपने कर्मों के प्रायश्चित की कोशिश कर रहे हैं.

दरअसल इस आन्दोलन की शुरुआत सालभर पहले इंदौर की चोइतराम मंडी से हुई. तब किसानों को प्याज के उचित दाम नहीं मिले. तब किसानों ने प्याज सड़क पर फेंककर अपना विरोध जताया. उसी दौरान फसल बीमा योजना के नाम पर किसानों से सरकार ने पचास हज़ार से लाख रूपए देने का वायदा किया,लेकिन मुआवजे ने नाम पर उन्हें दस बीस रूपए देकर टरका दिया गया. हालांकि तब सरकार ने प्याज की सरकारी खरीद कर मामले को रफा दफा करने की कोशिश भी की थी. तब भारतीय किसान यूनियन ने मध्यप्रदेश शासन को आन्दोलन की चेतावनी दी थी. यूं तो भीतर ही भीतर यह आन्दोलन सालभर से चल रहा था. लेकिन इसे हवा तब लग गई जब मंदसौर में आन्दोलनरत किसान उग्र हो गए.

खबर है कि आन्दोलनकारी पुलिस थाने का घेराव कर आगजनी करने वाले थे. पुलिस को इसकी भनक लग गई. इसी के चलते पुलिस को फायरिंग करनी पड़ गई. हालाँकि सरकार ने शुरू में इस तथ्य को सिरे से नकार दिया था. लेकिन बाद में माहौल बिगड़ता देख प्रदेश के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने इसे स्वीकार लिया. इस गोलीबारी में मारे जाने वाले छह किसानों में से चार पाटीदार थे. पाटीदारों की मध्यप्रदेश के मालवा और गुजरात में बड़ी तादाद है. इसके बाद प्रदेशभर में आक्रोश व्याप्त हो गया और मालवा के दो दर्जन से ज्यादा जिलों में आगजनी, बंद और घेराव जैसी घटनाएँ सामने आने लगी.

मध्यप्रदेश की राजनीति में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. इससे पहले 1998 में बैतूल जिले के मुलताई गोलीकांड में अठारह लोगों की मौत हो गई थी. तब तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को कुर्सी गंवानी पड़ गई थी. इस मामले में 66 मुक़दमे दर्ज किए गए.

राजनीतिक गलियारों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के अनशन की कई वजह मानी जा रही है. अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा के बाद से मध्यप्रदेश किसानों की उम्मीदें सरकार से बढ़ गई. लेकिन केंद्र सरकार और मध्यप्रदेश सरकार में तालमेल का आभाव होने से सरकार उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाई. वहीं राज्य सरकार पर ब्यूरोक्रेसी पूरी तरह हावी होने लगी. इसके चलते मुख्यमंत्री का अपने सहयोगियों पर भरोसा कमजोर होने लगा था. इससे पार्टी में अंतर्कलह बढ़ने लगा. सूबे की सियासत में मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह, काबिना मंत्री नरोत्तम मिश्रा, राज्य मंत्री विश्वास सारंग और संजय पाठक का दखल बढ़ने लगा.

दरअसल, संजय पाठक विजयरावगढ़ से कांग्रेस के विधायक थे. सालभर पहले शिवराज सिंह उन्हें भाजपा में लाए थे. उन्होंने पार्टी के साथ ही विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था. उपचुनाव में वे बतौर भाजपा प्रत्याशी खड़े हुए और फिर से विधायक बने. शिवराज सरकार ने तोहफे में उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया. इसे शिवराज विरोधी पचा नहीं पाए. इन्हीं सब कारणों से अपनी ही सरकार में शिवराज की पकड़ कमजोर होने लगी. सरकार ने सड़कों को छोड़कर कोई ठोस काम नहीं किए. सरकार के झूठे वादों से जनता के बीच साख कमजोर होने लगी. इसी बीच यह आन्दोलन पनप गया. नतीजा रहा कि सरकार अब सड़क पर है.

अगले साल मध्यप्रदेश और राजस्थान में चुनाव होने हैं. इसी साल के अंत में गुजरात में भी चुनाव हैं. ऐसे में इस आन्दोलन का विधानसभा चुनावों पर गहरा असर हो सकता है. केंद्र की नज़र में भी शिवराज सरकार की छवि कमज़ोर हो रही है. शायद यही वजह है कि केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री वेकैया नायडू के सिवाय अभी तक कोई वहां नहीं पहुंचा है. जबकि कांग्रेस इस मुद्दे को पूरी तरह से भुना रही है. इस बीच मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अनशन पर बैठकर साफ कर दिया है कि मध्यप्रदेश की कानून व्यवस्था बनाए रखने में उनकी सरकार पूरी तरह से विफल हो चुकी है.

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