नई दिल्ली: देश में मानसून की कमजोर चाल का असर अब जल संसाधनों पर साफ दिखाई देने लगा है। भारत के 166 प्रमुख जलाशयों में कुल जल भंडारण घटकर सिर्फ 27.5 प्रतिशत रह गया है, जो सामान्य क्षमता की तुलना में काफी कम है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब दक्षिण-पश्चिम मानसून इस वर्ष अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया है और मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे एल नीनो प्रभाव एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
जल संसाधन विभाग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष बारिश सामान्य से काफी कम रही है, जिसके कारण न केवल पेयजल आपूर्ति बल्कि खरीफ फसलों की बुआई पर भी असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
मानसून की धीमी चाल से घटा वर्षा का स्तर
मानसून सीजन शुरू होने के बाद अब तक देश में औसत वर्षा 48.5 मिमी दर्ज की गई है, जबकि सामान्य स्तर 80.6 मिमी होता है। यानी बारिश में काफी कमी देखी गई है, जिसका सीधा असर नदियों, तालाबों और बड़े जलाशयों में पानी की उपलब्धता पर पड़ा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस वर्ष मानसून की अनियमितता और एल नीनो परिस्थितियों ने वर्षा के पैटर्न को प्रभावित किया है, जिससे कई क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखा जैसे हालात बन रहे हैं।
एक साल पहले की तुलना में भी कम जल भंडारण
रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष जलाशयों में पानी का स्तर पिछले साल की तुलना में भी कम है। देश के 166 प्रमुख जलाशयों में से केवल हर पांच में से एक जलाशय ही आधे से अधिक भरा हुआ है। यह स्थिति कृषि और जल आपूर्ति दोनों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।
जल स्तर में गिरावट का सीधा असर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की जल आपूर्ति योजनाओं पर पड़ सकता है, खासकर गर्मी और आने वाले महीनों में जब मांग बढ़ती है।
मध्य भारत में सबसे अधिक बारिश की कमी
देश के विभिन्न हिस्सों में वर्षा की स्थिति अलग-अलग रही है। मध्य भारत, जो खरीफ फसलों के उत्पादन के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है, वहां 62 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है। यह स्थिति कृषि उत्पादन के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर सकती है।
पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में भी हालात बेहतर नहीं हैं, जहां सामान्य से 42 प्रतिशत कम बारिश हुई है। दक्षिण भारत में 21 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे वहां भी जल संकट के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
उत्तर-पश्चिम भारत में थोड़ी राहत
हालांकि उत्तर-पश्चिम भारत में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही है, जहां केवल 2 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसका मुख्य कारण पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) को माना जा रहा है, जिसने इस क्षेत्र में कुछ हद तक बारिश सुनिश्चित की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले हफ्तों में मानसून सक्रिय नहीं हुआ तो देश के कई हिस्सों में जल संकट और गहरा सकता है।
कृषि और अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
जलाशयों में गिरता जल स्तर और कमजोर मानसून का सबसे बड़ा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। खरीफ सीजन की फसलों जैसे धान, मक्का, दलहन और तिलहन की बुआई पर इसका सीधा प्रभाव देखने को मिल सकता है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बारिश की स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो उत्पादन में गिरावट और खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना भी बन सकती है।
आगे की स्थिति पर नजर
मौसम विभाग लगातार मानसून की स्थिति पर नजर बनाए हुए है। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में मानसूनी हवाओं की सक्रियता बढ़ सकती है, जिससे कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि फिलहाल देश के कई हिस्सों में पानी की कमी और सूखे जैसी स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है।
सरकार और राज्य प्रशासन भी जल संरक्षण और वैकल्पिक जल आपूर्ति उपायों पर ध्यान दे रहे हैं ताकि संभावित संकट को कम किया जा सके।
