नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कथित ‘देश विरोधी’ नारे, भाषण और मीम्स से जुड़े कंटेंट को हटाने और ब्लॉक करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। याचिका में केंद्र सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसे कंटेंट की पहचान कर उसे हटाने के निर्देश देने की मांग की गई थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की सलाह दी।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा- वैकल्पिक उपाय अपनाएं
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमति नहीं जताई। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अहमदाबाद के याचिकाकर्ता हितेंद्र कुमार परसोट्टमभाई गढ़िया की ओर से अधिवक्ता बरुण सिन्हा ने पक्ष रखा।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपाय अपना सकते हैं। अदालत ने इस याचिका को सोशल मीडिया कंटेंट से संबंधित एक अन्य लंबित मामले के साथ जोड़ने की मांग को भी स्वीकार नहीं किया।
सोशल मीडिया पोस्ट हटाने की थी मांग
याचिका में केंद्र सरकार और X Corp, फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम तथा व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कथित आपत्तिजनक पोस्ट की पहचान कर उन्हें हटाने या ब्लॉक करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता का दावा था कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट, मीम्स, नारे और भाषण ऐसे हैं, जिनसे सामुदायिक सौहार्द, राष्ट्रीय अखंडता, सार्वजनिक व्यवस्था और न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। याचिका में ऐसे कंटेंट के प्रसार पर रोक लगाने के लिए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई थी।
फर्जी संदेशों और भड़काऊ कंटेंट का भी किया गया जिक्र
याचिका में SMS और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए कथित फर्जी संदेशों के प्रसार का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता ने कुछ कथित सुरक्षा खतरों और भीड़ से जुड़ी घटनाओं का हवाला देते हुए दावा किया कि इससे राष्ट्रीय राजधानी और कई राज्यों की राजधानियों में कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की स्थिति पैदा हुई।
याचिका में यह भी कहा गया कि कथित फर्जी खबरों, उकसाने वाले बयानों और भाषणों के प्रसार से सामाजिक सौहार्द और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि, ये सभी दावे याचिकाकर्ता की ओर से याचिका में किए गए थे और सुप्रीम कोर्ट ने इन दावों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया।
केंद्र के दो मंत्रालयों को भी बनाया गया था पक्षकार
जनहित याचिका में सोशल मीडिया कंपनियों के अलावा केंद्रीय गृह मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी प्रतिवादी बनाया गया था। याचिकाकर्ता ने अदालत से निर्देश देने की मांग की थी कि ऐसे पोस्ट हटाए जाएं जो उनके अनुसार सामुदायिक सौहार्द, राष्ट्रीय अखंडता और न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं या संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के अधिकार को कमजोर कर सकते हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस PIL को सुनने से इनकार कर दिया। अदालत ने इसे किसी अन्य लंबित सोशल मीडिया मामले के साथ जोड़ने की मांग भी खारिज कर दी। बुधवार की सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता को उन वैकल्पिक कानूनी उपायों का सहारा लेने के लिए कहा गया है, जिनका पीठ ने उल्लेख किया।
