नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने फ्लैट खरीदारों को राहत देते हुए कहा है कि जिन लोगों ने सरकारी मंजूरी और आधिकारिक राजस्व रिकॉर्ड पर भरोसा करके मकान खरीदे हैं, उन्हें सरकारी अधिकारियों की गलतियों का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए। कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया है कि जल निकाय की जमीन पर बने 20 फ्लैटों को गिराने से पहले उनके मालिकों को समान मूल्य की दूसरी खाली जमीन उपलब्ध कराई जाए। इसके लिए कोर्ट ने प्राथमिकता के आधार पर छह महीने के भीतर वैकल्पिक जमीन आवंटित करने को कहा है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन पर जारी किए गए रैयतवारी पट्टे (Ryotwari Patta) को रद्द करने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जल निकायों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन सरकारी अधिकारियों के फैसलों पर भरोसा करके संपत्ति खरीदने वाले लोगों के साथ होने वाली परेशानी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले के थिरुमुल्लैवोयल गांव की 0.72 एकड़ जमीन से जुड़ा है। सरकारी रिकॉर्ड में इस भूमि को ‘Government Poramboke – Kanakkan Kuttai’ के रूप में दर्ज किया गया था। इसका अर्थ है कि जमीन सरकारी तालाब या सार्वजनिक जल निकाय की श्रेणी में आती है, जिस पर निजी स्वामित्व का दावा नहीं किया जा सकता।
साल 2011 में तिरुवल्लूर के जिला राजस्व अधिकारी ने इस जमीन पर पी. रामदॉस के नाम रैयतवारी पट्टा जारी कर दिया था। इसके बाद रामदॉस ने जमीन को तमिलनाडु मर्केंटाइल बैंक के पास गिरवी रखकर 3.40 करोड़ रुपये की ऋण सुविधा प्राप्त की। विवादित भूमि के एक हिस्से, यानी 0.22 एकड़, को उनकी पत्नी के नाम हस्तांतरित किया गया। बाद में उनकी पत्नी ने एक बिल्डर के पक्ष में पावर ऑफ अटॉर्नी जारी की।
बिल्डर ने जमीन पर 20 आवासीय फ्लैट बनाए और उन्हें अलग-अलग खरीदारों को बेच दिया। खरीदारों को फ्लैट के साथ जमीन में अविभाजित हिस्सेदारी भी दी गई।
पट्टा रद्द होने के बाद शुरू हुआ विवाद
साल 2014 में एक तीसरे पक्ष ने जमीन पर जारी पट्टे को चुनौती दी। मामले की सुनवाई के बाद दिसंबर 2019 में भूमि प्रशासन आयुक्त ने पट्टा रद्द कर दिया। आयुक्त का कहना था कि सरकारी जल निकाय के रूप में दर्ज जमीन पर पट्टा जारी करना गैरकानूनी था।
इसके बाद मद्रास हाई कोर्ट ने भी पट्टा रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने जमीन पर बने अनधिकृत निर्माणों को हटाने और जल निकाय को उसके मूल स्वरूप में बहाल करने का निर्देश दिया। इस फैसले को फ्लैट मालिक और तमिलनाडु मर्केंटाइल बैंक ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सरकारी मंजूरी पर भरोसा करके खरीदे गए थे फ्लैट
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ध्यान दिलाया कि संबंधित नगर निकाय ने फ्लैटों के निर्माण के नक्शे मंजूर किए थे। वहीं, राजस्व विभाग ने टाउन सर्वे लैंड रजिस्टर में बदलाव करने के साथ विवादित जमीन के उप-विभाजन को भी मंजूरी दी थी।
अदालत के अनुसार, सरकारी विभागों की इन कार्रवाइयों के कारण फ्लैट खरीदने वालों को यह विश्वास हुआ कि संपत्ति कानूनी रूप से खरीदी जा सकती है। ऐसे में केवल अधिकारियों की गलतियों के कारण खरीदारों को भारी आर्थिक नुकसान उठाने के लिए छोड़ देना उचित नहीं होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि फ्लैटों को गिराने से पहले खरीदारों की परिस्थितियों और उनके कानूनी विकल्पों पर विचार नहीं किया गया, तो उन्हें अपूरणीय आर्थिक क्षति हो सकती है और कई परिवारों के सिर से छत छिन सकती है।
जल निकाय की जमीन पर निर्माण को नहीं मिली कानूनी मान्यता
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि जल निकायों को सुरक्षित रखना सरकार की जिम्मेदारी है। जमीन को शहरी विकास योजना में मिश्रित आवासीय क्षेत्र (Mixed Residential Zone) के रूप में दिखाए जाने से उसका मूल कानूनी स्वरूप नहीं बदल जाता। इसलिए इस आधार पर विवादित जमीन को निजी निर्माण के लिए वैध नहीं माना जा सकता।
अदालत ने पट्टा रद्द करने के फैसले को बरकरार रखते हुए तमिलनाडु के मुख्य सचिव और तिरुवल्लूर के जिला कलेक्टर को निर्देश दिया कि वे 20 फ्लैट मालिकों को समान मूल्य की खाली जमीन आवंटित करें। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही फ्लैटों को गिराने की कार्रवाई आगे बढ़ाई जाए।
खरीदारों को राहत, लेकिन पट्टा रद्द करने का फैसला बरकरार
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उद्देश्य सरकारी जल निकाय को अतिक्रमण से मुक्त कराने और उन खरीदारों के हितों के बीच संतुलन बनाना है, जिन्होंने आधिकारिक दस्तावेजों और सरकारी मंजूरियों पर भरोसा करके अपनी पूंजी घर खरीदने में लगाई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी अधिकारियों की चूक के कारण निर्दोष खरीदारों को अकेले नुकसान नहीं उठाना चाहिए। हालांकि, वैकल्पिक जमीन देने का निर्देश विवादित भूमि पर निजी अधिकार को वैध ठहराने के समान नहीं है।
