नई दिल्ली: OBC क्रीमी लेयर के निर्धारण से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की स्पष्टीकरण याचिका पर गुरुवार, 24 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। केंद्र ने 11 मार्च 2026 के उस फैसले के क्रियान्वयन को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी OBC उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में रखने का फैसला केवल उसके माता-पिता की सैलरी के आधार पर नहीं किया जा सकता। माता-पिता के पद और उनकी सेवा-स्थिति को भी ध्यान में रखना होगा। इस मामले की सुनवाई जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने की।
केंद्र ने फैसले के पूर्वव्यापी असर पर जताई चिंता
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि मार्च के फैसले को पुराने मामलों पर लागू करने से पहले से हो चुकी भर्तियों, नियुक्तियों और दाखिलों पर असर पड़ सकता है। सरकार के मुताबिक, नियमों और उस समय जारी प्रमाणपत्रों के आधार पर पूरी हो चुकी प्रक्रियाओं को बाद में बदले हुए पात्रता मानदंड के आधार पर दोबारा खोलने से OBC-NCL स्थिति, वरिष्ठता, सेवा शर्तों और करियर प्रगति को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है। उच्च शिक्षण संस्थानों और पेशेवर संस्थानों में हुए दाखिलों पर भी इसका प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई है।
दो साल में पोस्ट की समानता तय करने का प्रस्ताव
केंद्र ने अन्य संगठनों में कार्यरत अभिभावकों के पदों की सरकारी पदों के साथ समानता तय करने के लिए दो साल का समय मांगा है। सरकार का कहना है कि PSU, बैंक, विश्वविद्यालय और निजी क्षेत्र जैसी संस्थाओं में पदों की सरकारी पदों से समानता निर्धारित करने के लिए संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श और एक समान व्यवस्था की जरूरत होगी। सुप्रीम कोर्ट के मार्च के फैसले में भी यह स्पष्ट किया गया था कि OBC क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल वेतन आधारित नहीं हो सकता और संबंधित पद की स्थिति महत्वपूर्ण है।
958 UPSC उम्मीदवारों के सेवा आवंटन का मामला
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 में अनुशंसित 958 उम्मीदवारों को सेवा आवंटित करने की अनुमति भी मांगी है। सरकार का कहना है कि स्पष्टीकरण याचिका पर निर्णय लंबित रहने के कारण इन उम्मीदवारों के फाउंडेशन कोर्स और प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रभावित हो सकते हैं। केंद्र ने यह अनुरोध मौजूदा 8 अगस्त 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम के आधार पर सेवा आवंटन की अनुमति देने के लिए किया है।
2016 से 2025 के बीच लाखों आरक्षित पदों पर हुई नियुक्तियां
केंद्र के अनुसार, 2016 से 2025 के बीच केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों और उनसे जुड़े कार्यालयों में 5.69 लाख से अधिक आरक्षित रिक्तियां भरी गईं, जिनमें करीब 3.70 लाख OBC रिक्तियां शामिल थीं। सरकार ने आशंका जताई है कि यदि मार्च के फैसले को पूर्वव्यापी रूप से लागू किया गया तो पुरानी नियुक्तियों और सिविल सेवा परीक्षाओं में हुए सेवा आवंटन पर दोबारा विचार की स्थिति बन सकती है। इससे सेवा और कैडर आवंटन, वरिष्ठता तथा पदोन्नति से जुड़े मामलों पर भी असर पड़ सकता है।
मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
11 मार्च के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम और 2004 के स्पष्टीकरण की व्याख्या करते हुए कहा था कि माता-पिता की सैलरी को अकेले आधार बनाकर OBC क्रीमी लेयर की स्थिति तय नहीं की जा सकती। कोर्ट के अनुसार, संबंधित अभिभावक के पद और उसकी श्रेणी को भी देखा जाना जरूरी है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि 2004 का स्पष्टीकरण 1993 की मूल नीति में ऐसी नई शर्त नहीं जोड़ सकता, जो उसमें पहले से मौजूद नहीं थी।
अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की स्पष्टीकरण याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। फैसले में यह स्पष्ट होगा कि 11 मार्च के निर्णय को पहले से पूरी हो चुकी भर्तियों, नियुक्तियों और दाखिलों पर किस तरह लागू किया जाएगा।

