नई दिल्ली. भारत में शिक्षा की लागत पर अक्सर स्कूल फीस, छात्रवृत्ति योजनाओं और सरकारी कार्यक्रमों की चर्चा होती है, लेकिन 2026 में देश एक अलग तरह की कीमत चुका रहा है। यह कीमत है परीक्षा प्रणाली की विफलताओं की, जिसे अब ‘डैमेज कंट्रोल’ के नाम पर भारी खर्च के जरिए संभालने की कोशिश की जा रही है।
Central Board of Secondary Education के ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) विवाद और NEET-UG परीक्षा संकट ने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सरकार और संबंधित एजेंसियां छात्रों का भरोसा वापस जीतने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं।
CBSE विवाद ने बढ़ाया आर्थिक बोझ
CBSE के आंकड़ों के अनुसार, कक्षा 12 के परिणाम जारी होने के बाद 4.04 लाख से अधिक छात्रों ने अपनी उत्तर पुस्तिकाएं देखने के लिए आवेदन किया। कुल मिलाकर 11.31 लाख से ज्यादा उत्तर पुस्तिकाओं की मांग की गई।
यह केवल जिज्ञासा का मामला नहीं था, बल्कि बड़ी संख्या में छात्रों को मूल्यांकन प्रक्रिया पर संदेह था। OSM प्रणाली, पोर्टल क्रैश और उत्तर पुस्तिकाओं को लेकर उठे सवालों के बाद बोर्ड को फीस में भारी कटौती करनी पड़ी।
उत्तर पुस्तिका देखने की फीस 700 रुपये से घटाकर 100 रुपये कर दी गई, जबकि सत्यापन और पुनर्मूल्यांकन शुल्क में भी बड़ी कमी की गई। इससे छात्रों को राहत जरूर मिली, लेकिन CBSE को लगभग 68 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान उठाना पड़ा।
कुल खर्च 100 करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल फीस कटौती तक सीमित नहीं है। लाखों उत्तर पुस्तिकाओं को अपलोड करना, शिकायतों का समाधान करना, पोर्टल को स्थिर रखना, अतिरिक्त मूल्यांकन और तकनीकी सहायता जैसी प्रक्रियाओं पर भी भारी खर्च हो रहा है।
अनुमान है कि OSM विवाद से जुड़े पूरे ‘डैमेज कंट्रोल’ अभियान की लागत 100 करोड़ रुपये के करीब पहुंच सकती है।
NEET संकट बना और भी बड़ा आर्थिक झटका
अगर CBSE विवाद महंगा साबित हुआ, तो NEET संकट उससे भी बड़े स्तर पर सामने आया। 22 लाख से अधिक छात्रों वाली इस परीक्षा में पेपर लीक, सुरक्षा चिंताओं और प्रशासनिक गड़बड़ियों ने व्यवस्था को झकझोर दिया।
रिफंड, दोबारा परीक्षा, सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी तंत्र और तकनीकी सुधारों पर भारी खर्च का अनुमान लगाया जा रहा है। केवल रिफंड का खर्च ही करीब 330 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
परीक्षा संचालन पर भी करोड़ों का खर्च
देशभर में परीक्षा आयोजित करने के लिए परीक्षा केंद्र, प्रश्नपत्र छपाई, सुरक्षा, निगरानी, पर्यवेक्षक, डेटा प्रोसेसिंग और हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाओं पर भी बड़ा खर्च होता है।
अगर प्रति छात्र केवल 1000 रुपये संचालन लागत मानी जाए, तो कुल खर्च 220 करोड़ रुपये से अधिक बैठता है। इस तरह NEET संकट की कुल लागत 550 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंचने का अनुमान है।
भरोसा टूटने की कीमत चुका रहा देश
विशेषज्ञों का कहना है कि असली समस्या केवल खर्च की नहीं, बल्कि योजना और तैयारी की कमी की है। अगर पहले से साइबर सुरक्षा, डिजिटल प्लेटफॉर्म टेस्टिंग, पारदर्शी मूल्यांकन और मजबूत निगरानी तंत्र पर निवेश किया जाता, तो इतने बड़े संकट से बचा जा सकता था।
अब सरकार को शिक्षा सुधार के बजाय ‘भरोसा बहाल’ करने पर भारी रकम खर्च करनी पड़ रही है।
‘एग्जाम कंटिजेंसी फंड’ की उठी मांग
इन विवादों के बाद शिक्षा विशेषज्ञ परीक्षा संकटों से निपटने के लिए अलग “एग्जाम कंटिजेंसी फंड” बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जैसे प्राकृतिक आपदाओं के लिए राहत कोष होता है, वैसे ही बड़े परीक्षा संकटों के लिए भी स्थायी फंड होना चाहिए।
यह फंड साइबर हमलों, पेपर लीक, पुनर्परीक्षा, बड़े स्तर पर पुनर्मूल्यांकन और छात्रों के मुआवजे जैसे मामलों में तुरंत उपयोग किया जा सकेगा।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत
NEET और CBSE विवादों ने यह साफ कर दिया है कि भारत की परीक्षा प्रणाली अब इतनी बड़ी और डिजिटल हो चुकी है कि केवल अस्थायी उपायों से काम नहीं चल सकता।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते मजबूत और पारदर्शी व्यवस्था नहीं बनाई गई, तो आने वाले वर्षों में ऐसे संकट और महंगे साबित हो सकते हैं।

