नई दिल्ली. भारत की सबसे महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में शामिल जोजिला टनल अब अपने अंतिम ब्रेकथ्रू चरण में पहुंच गई है। हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों के बीच बन रही यह सुरंग पूरी होने के बाद कश्मीर और लद्दाख के बीच सालभर निर्बाध सड़क संपर्क सुनिश्चित करेगी। इसके साथ ही यह दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित सबसे लंबी सिंगल-ट्यूब, दो-तरफा सड़क सुरंगों में शामिल होगी।
करीब 13.15 किलोमीटर लंबी यह सुरंग जम्मू-कश्मीर के बालटाल और लद्दाख के द्रास क्षेत्र के मीनामार्ग को जोड़ेगी। समुद्र तल से लगभग 11,578 फीट की ऊंचाई पर बन रही यह परियोजना क्षेत्र की तस्वीर बदलने वाली मानी जा रही है।
हर सर्दी में कट जाता था लद्दाख का संपर्क
दशकों से जोजिला दर्रा देश के सबसे कठिन और खतरनाक पर्वतीय मार्गों में गिना जाता रहा है। भारी बर्फबारी, हिमस्खलन और बर्फीले तूफानों के कारण सर्दियों में यह रास्ता कई महीनों तक बंद हो जाता था। इससे लद्दाख का देश के बाकी हिस्सों से संपर्क लगभग टूट जाता था।
जोजिला टनल के निर्माण के बाद मौसम की मार से होने वाली यह समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। लोगों, आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आवाजाही पूरे वर्ष जारी रह सकेगी।
तीन घंटे का सफर अब 15 मिनट में
इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ यात्रा समय में भारी कमी के रूप में सामने आएगा। वर्तमान में जोजिला दर्रे को पार करने में सामान्य परिस्थितियों में लगभग तीन घंटे का समय लगता है, जबकि खराब मौसम में यह और अधिक बढ़ जाता है।
टनल शुरू होने के बाद यही दूरी महज 15 मिनट में तय की जा सकेगी। इससे यात्रियों, व्यापारियों और स्थानीय निवासियों को बड़ी राहत मिलेगी।
आधुनिक तकनीक से लैस होगी सुरंग
जोजिला टनल को अत्याधुनिक सुरक्षा और निगरानी प्रणालियों से लैस किया जा रहा है। पूरी सुरंग में सीसीटीवी निगरानी, आधुनिक वेंटिलेशन सिस्टम, आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था, रेडियो संचार नेटवर्क और निर्बाध बिजली आपूर्ति जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी।
इसके अलावा यातायात की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके।
सिर्फ सुरंग नहीं, पूरा आधुनिक कॉरिडोर
यह परियोजना केवल एक सुरंग तक सीमित नहीं है। लगभग 30 किलोमीटर लंबे पूरे कॉरिडोर में एप्रोच रोड, अतिरिक्त सुरंगें, स्नो गैलरी, कट-एंड-कवर संरचनाएं, बड़े पुल और सुरक्षा ढांचे का निर्माण भी किया जा रहा है।
इन सभी सुविधाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अत्यधिक बर्फबारी और खराब मौसम के बावजूद मार्ग चालू रहे।
कठिन परिस्थितियों में हुआ निर्माण
जोजिला टनल का निर्माण इंजीनियरिंग के लिहाज से बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। यहां सर्दियों में तापमान कई बार माइनस 20 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है। निर्माण कार्य के दौरान श्रमिकों और इंजीनियरों को कई बार हिमस्खलन और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
पर्वतीय चट्टानों की बदलती संरचना के कारण इंजीनियरों को खुदाई की तकनीक में कई बार बदलाव भी करना पड़ा। इसके बावजूद परियोजना लगातार आगे बढ़ती रही।
पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
जोजिला टनल के शुरू होने से पर्यटन क्षेत्र को भी बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। Sonamarg, Kargil और Ladakh जैसे पर्यटन स्थलों तक पूरे वर्ष आसान पहुंच संभव हो जाएगी।
पर्यटकों की संख्या बढ़ने से होटल, परिवहन, स्थानीय व्यापार और पर्यटन से जुड़े अन्य क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होंगे।
सामरिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण
यह परियोजना केवल विकास और पर्यटन तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्रीनगर-लेह राजमार्ग भारतीय सेना के लिए एक अहम सप्लाई रूट है, जिसके जरिए सीमावर्ती क्षेत्रों तक सैनिकों, हथियारों और आवश्यक सामग्री की आपूर्ति की जाती है।
सालभर सड़क संपर्क उपलब्ध होने से सैन्य तैयारियों और रसद आपूर्ति को बड़ी मजबूती मिलेगी। यही वजह है कि जोजिला टनल को देश की महत्वपूर्ण रणनीतिक परियोजनाओं में गिना जा रहा है।
2028 तक पूरा होने का लक्ष्य
सुरंग की खुदाई का अंतिम चरण पूरा होने के बाद अब टनल लाइनिंग, विद्युत व्यवस्था, वेंटिलेशन सिस्टम, सुरक्षा उपकरणों और अन्य तकनीकी कार्यों पर ध्यान दिया जाएगा। सभी कार्य पूरे होने के बाद इसे यातायात के लिए खोला जाएगा।
सरकार का लक्ष्य इस महत्वाकांक्षी परियोजना को वर्ष 2028 तक पूरी तरह तैयार कर जनता को समर्पित करने का है। इसके पूरा होने के बाद कश्मीर और लद्दाख के बीच कनेक्टिविटी का एक नया अध्याय शुरू होगा और हिमालयी क्षेत्र में विकास की रफ्तार को नई गति मिलेगी।

