नई दिल्ली. केंद्र सरकार Nari Shakti Vandan Adhiniyam को लागू करने के रास्ते में मौजूद सबसे बड़ी शर्तोंcensus और delimitation—को लेकर नए ऑप्शन पर विचार कर रही है। अभी लागू कानून के अनुसार लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तभी प्रभावी होगा, जब कानून लागू होने के बाद पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित हों और उसके आधार पर परिसीमन कराया जाए।
लेकिन अब मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि सरकार इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए नया संवैधानिक संशोधन ला सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यदि census और delimitation की मौजूदा शर्त को बदला जाता है, तो महिला आरक्षण को तय समय से पहले लागू करने की राह खुल सकती है। हालांकि इस पर अभी तक आधिकारिक सरकारी नोटिफिकेशन या संसद में पारित संशोधन सामने नहीं आया है।
महिला आरक्षण के साथ पहला चुनाव कौन सा होगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि महिला आरक्षण के साथ पहला चुनाव कौन सा होगा। सरकार का प्राथमिक लक्ष्य 2029 के बाद होने वाले लोकसभा चुनाव को माना जा रहा है। यदि प्रस्तावित बदलाव आगे बढ़ते हैं, तो 2029 का आम चुनाव वह पहला राष्ट्रीय चुनाव हो सकता है जिसमें महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित दिखाई दें। इसी के साथ कुछ राज्यों की विधानसभाओं में भी यह व्यवस्था लागू हो सकती है। यह दावा फिलहाल मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है, न कि अंतिम कानूनी स्थिति पर।
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि यदि संसद में संशोधन तेजी से पारित हो जाते हैं, तो 2027 के कुछ विधानसभा चुनावों में early rollout संभव हो सकता है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे बड़े राज्यों के चुनावों का नाम भी संभावित तौर पर लिया जा रहा है। लेकिन इस संभावना को अभी केवल एक राजनीतिक और विधायी विकल्प के रूप में देखना चाहिए, क्योंकि मौजूदा कानून में ऐसी तत्काल व्यवस्था नहीं है।
वर्तमान कानून में 816 सीटों का कोई प्रावधान सीधे दर्ज नहीं
अब बात उस new formula की, जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में लगभग 50% बढ़ोतरी कर संख्या 816 तक ले जाने का विचार सामने आया है। इस गणित के आधार पर महिलाओं के लिए लगभग 273 सीटें आरक्षित हो सकती हैं। इसी तरह राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटों की संख्या बढ़ाने का फार्मूला जोड़ा जा रहा है, ताकि एक-तिहाई आरक्षण लागू किया जा सके और राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन भी बना रहे। लेकिन यह पूरा ढांचा अभी प्रस्तावित बताया जा रहा है; वर्तमान कानून में 816 सीटों का कोई प्रावधान सीधे दर्ज नहीं है।
यह आरक्षण 15 वर्ष की अवधि के लिए होगा
मौजूदा अधिनियम का ढांचा साफ कहता है कि महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा पर लागू होगा। इसमें SC/ST reserved seats के भीतर भी महिलाओं के लिए आरक्षण शामिल होगा। साथ ही, यह आरक्षण 15 वर्ष की अवधि के लिए होगा और सीटों का rotation परिसीमन के बाद तय किया जाएगा। राज्यसभा और विधान परिषदों के लिए यह प्रावधान फिलहाल लागू नहीं है।
इस पूरे मुद्दे का राजनीतिक पक्ष भी अहम
इस पूरे मुद्दे का राजनीतिक पक्ष भी अहम है। कई विपक्षी दल पहले से कहते रहे हैं कि महिला आरक्षण को census और delimitation से अलग किया जाना चाहिए, ताकि इसे जल्दी लागू किया जा सके। यही वजह है कि अगर सरकार संशोधन लाती है, तो उसे कुछ विपक्षी दलों का समर्थन भी मिल सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस विषय पर सहमति बनाने की कोशिशें चल रही हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर संसद में विधेयक आने और उसके पारित होने के बाद ही साफ होगी।
कुल मिलाकर, अभी की legal position यह है कि महिला आरक्षण कानून मौजूद है, लेकिन उसकी शुरुआत जनगणना और परिसीमन के बाद ही होनी है। वहीं political discussion यह संकेत दे रही है कि सरकार इस शर्त को नरम या बदलने पर विचार कर सकती है। इसलिए 2027 या 2029 में से कौन सा चुनाव महिलाओं के 33% quota के साथ पहला होगा, इसका पक्का जवाब अभी नहीं, बल्कि आने वाले संसदीय कदम तय करेंगे।
